खास-मेहमान

यौन हिंसा की वीभत्स लज्जाजनक एवं डरावनी घटनाओं पर सुनील दत्ता ‘कबीर’ की राय

सुनील दत्ता ‘कबीर’
(स्वतंत्रत पत्रकार-समीक्षक)

देश के विभिन्न क्षेत्रो में यौन हिंसा की वीभत्स लज्जाजनक एवं डरावनी घटनाए पिछले कई सालो से घटती रही हैं। इन घटनाओं की संख्या और उनकी जघन्यता साल दर साल बढ़ रही है। प्रचार माध्यमि द्वारा दिन प्रतिदिन बच्चियों किशोरियों और महिलाओं के साथ हो रही जघन्य एवं वीभत्स दुष्कर्म और सामूहिक दुष्कर्म की बढती सूचनाये दिखाई और सुनाई जा रही है।
दुष्कर्मो की बढती घटनाओं को रोकने के लिए अपराधियों को कड़ी सजा देने की माँग भी उठ रही है। इसके फलस्वरूप भी केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये ”साक्ष्य अधिनियम कानून” ”अपराधिक कानून प्रक्रिया संहिता ” तथा पाक्सो ( बच्चो को यौन अप्रदाह से संरक्षण कानून ) में संसोधन करके उसमे दुष्कर्म बलात्कार के दोषियों को दण्डित करने के लिए कड़े प्राविधानो को जोड़ा गया है। कम उम्र की बच्चियों के प्रति किये गये यौन हिंसा पर फाँसी तक का प्राविधान किया गया है। लेकिन क्या इन व अन्य कठोर कानूनों से दुष्कर्म की घटनाए रुक पाएंगी ? उनमे कमी आ पाएगी ? इसकी उम्मीद कम है। एक तो इसलिए की देश में अपराधो को रोकने के कानूनों को व्यवस्थित ढंग से और कड़ाई से लागू करने का रिकार्ड बहुत खराब है। बच्चो को यौन अपराधो से संरक्षण देने के लिए लागू किये गये ‘पाक्सो ‘ कानूनों के वावजूद यौन अपराधो में निरंतर वृद्धि का उदाहरण हमारे सामने है। इसके अलावा नये सख्त कानूनों के वावजूद यौन हिंसा एवं दुष्कर्म की घटनाओं में कमी न आने की आशंका का दूसरा प्रमुख कारण समाज में फैलता या फैलाया जा रहा ‘यौन प्रदुषण’ है। बढ़ते वायुमंडलीय प्रदुषण, जल प्रदुषण खाद्य प्रदुषण की तरह ही समाज की मानसिकता और संस्कृति को विभिन्न रूपों में प्रदूषित किया जा रहा है। इसी प्रदुषण के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की नशाखोरी के प्रदुषण के साथ यौन प्रदुषण के को भी बढ़ाया जा रहा है। इसका परीलक्षण”सामाजिक और पारिवारिक जीवन के विभिन्न रूपों में बढ़ रहा है। इस तरह के परीलक्षण समाज में व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता के अधिकार, नारी स्वतंत्रता के अधिकार तथा अन्य पहनावे ओढने के तथा रहन – सहन के स्वतंत्रता के अधिकार तथा स्वतंत्रताओ के बढ़ते अधिकारों के साथ स्पष्टता के साथ होता रहा है। अभी तक माने सामाजिक एवं पारिवारिक नियंत्रण को अराजकतापूर्ण ढंग से छिन्न-भिन्न करते हुए उपरोक्त स्वतंत्रताओ को बढावा दिया जा रहा है। बिना शादी – व्याह के ही व्यस्क युवक-युवतिया को एक साथ रहने की (लिव इन रिलेश्न्न्शिप की ) कानूनी छुट व स्वतंत्रता दिया जाना भी इसी का परीलक्षण है।

बताने की जरूरत नही है कि यह कानूनी स्वतंत्रता एक साथ रहने की ही स्वतंत्रता नही है, बल्कि सामजिक मान्यताओं के विपरीत उच्छ्रीखल यौन सम्बन्धो की स्वतंत्रता भी है।
यौन सम्बन्धो की ऐसी ही स्वतंत्रताओ को समाज में विभिन्न रूपों में बढ़ावा देते हुए सामजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धो के चले आ रहे प्राचीन ही नही बल्कि आधुनिक युग के व्यवस्थित ताने-बाने को तोड़ा और नष्ट किया जा रहा है। यौन सम्बन्धो यौन क्रियाओं की प्रचारित समस्याओं और उसके विविध रूपों वाले प्रचारित समाधानों की बाढ़ के साथ साथ सुरक्षित एवं उच्छ्रिखल यौन सम्बन्धो को इलेक्ट्रानिक एवं प्रिंट मीडिया में निरंतर प्रचारित किया जा रहा है। स्थित यह है कि नामी गिरामी समाचार पत्रों के पूरे के पूरे पेज पर ऐसी सूचनाओ को अर्द्धनग्न चित्रों के साथ प्रकाशित किया जाता है। एक ही समाचार पत्र के एक पेज पर दुष्कर्म की घटनाओं की सूचनाए रहती है, किसी दूसरे पेज पर उस घटना पर गंभीर चिंता चर्चा दुःख और उन्हें रोकने की सलाहे रहती है और बाद के किसी पेज पर यौन समस्याओं के समाधान के नाम पर अर्द्धनग्न विज्ञापन एवं प्रचार भरे होते है। इसके अलावा आम उपभोग के तमाम मालो सामानों के प्रचारों पैकजो पर नारियो की दैहिक सुन्दरता और उनके अर्द्धनग्न प्रोग्रामो का दिन रात प्रसारण किया जाता है। सच्चाई को बताने-दिखने के नाम पर पिछले 30-40 सालो से उन्मुक्त एवं उच्छ्रीखल यौन सम्बन्धो को लेकर बन रही फिल्मो की बाढ़ आती रही है। खुले यौन सम्बन्धो को बच्चो के साथ यौन सम्बन्धो को खुले आम प्रदर्शित करने वाली वेवसाईट इंटरनेट पर उपलब्द्ध है। आम समाज के पहनावे-ओढ़ावे में खासकर लडकियों के पहनावे में आधुनिक फैशन और फिल्मो के रंग ढंग की अंधा-धुंध नकल को लगातार बढ़ावा मिल रहा है यह खुद अभिभावकों द्वारा दिया जा रहा है। अगर लड़के आधी बांह की शर्ट जींस फैशनबुल कुरता पजामा या शूट पहन रहे है तो लडकिया बिना बांह वाले काफी नीचे तक कटे वस्त्र पहन रही है। यौन सम्बन्धो पर खुली या कहिये नग्नता पूर्ण चर्चाओं के साथ मर्यादित एवं माने वैवाहिक सम्बन्धो की जगह गैर वैवाहिक यौन सम्बंधों को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्त्री पुरुष के बीच यौन आकर्षण और यौन सबंध को नैसर्गिक बताते हुए सदियों से चली आ रही यौन सम्बन्धो की सामाजिक पारिवारिक वर्जनाओं को नकारा जा रहा है। इन सब का परीलक्षण बढ़ते उच्छ्रीखल पूर्णता यौन सम्बन्धो में तथा यौन हिंसा की बढती घटनाओं में होता रहा है। यौन सम्बंधों के इन व अन्य प्रचारों व्यवहारों को समाज में बढ़ता यौन प्रदूषण ही कहा जाना चाहिए। पिछले 30-35 सालो में तेजी से बढ़ रही बाजारवादी व्यवस्था के धनाढ्य मालिको संचालको ने असली नकली शुद्द-अशुद्ध आवश्यक-अनाश्यक मालो-सामानों को बाजार का हिस्सा बना दिया है। धुंआधार प्रचारों के जरिये जन – जन में उसके प्रति ललक – लालच खड़ा कर दिया है। ऐसे ही सामानों के उपभोग को लोगो के दिलो दिमाग पर चढाया जा रहा है ठीक इसी तरह यौन चर्चाओं एवं सम्बन्धो को विभिन्न रूपों में प्रचारित करके उसे युवा और प्रौढ़ आयु के लोगो पुरुषो-स्त्रियों खासकर नई उम्र के लड़के लडकियों के दिलो दिमाग में बैठाया जा रहा है। तरह – तरह की बढती नशाखोरी के साथ यौन सम्बन्धो का नशा भी दिया जा रहा है। वैश्वीकरणवादी बाजारवादी व्यवस्था की बढती आर्थिक, सामाजिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप जिस तरह आर्थिक राजनितिक क्षेत्र में आर्थिक एवं राजनितिक भ्रष्टाचार कदाचार बढ़ता जा रहा है, उसी तरह इस व्यवस्था के अंतर्गत सामाजिक जीवन में यौन कदाचार एवं यौन हिंसा की समस्याए घटनाए बढती रही है। ध्यान देने की बात यह है कि ये समस्याए विकसित साम्राज्यी देशो के साथ बढ़ते आर्थिक कुटनीतिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धो के साथ बढती रही है। अमरीका इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी देशो से उनकी पूंजी माल सामान के बढ़ते आगमन के साथ आती रही भोगवादी संस्कृति के अभिन्न अंग के रूप में बढ़ रही है। देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्चवर्गो द्वारा लागू की जा रही है। वैश्वीकरणवादी नीतियों के जरिये बढ़ाई जा रही है। इसके परिणाम स्वरूप समाज का नवयुवक वर्ग अपने पारिवारिक सामाजिक दायित्त्व से उदासीन तथा यौन हिंसा का अपराधी बनता जा रहा है। शिक्षा एवं रोजगार की समस्याओं के विरुद्ध आन्दोलन, संघर्ष करने की जगह नशाखोरी एवं अराजक बनता जा रहा है। इसके अलावा भोगवादी संस्कृति और यौन प्रवृतिया व्यवहारों से वैवाहिक सम्बन्धो के जरिये बना पारिवारिक जीवन का मूल आधार दरकता टूटता जा रहा है। देश दुनिया के उच्च आर्थिक कुटनीतिक हिस्से धर्म, जाति क्षेत्र के विवादों के जरिये सामाजिक एकजुटता को अधिकाधिक तोड़ते जाने के साथ ही पारिवारिक संस्थाए को भी तोड़ने में लगे हुए है। जनसाधारण की किसी भी स्तर की एकजुटता को बाटने – तोड़ने का सुनियोजित प्रयास करते रहे है। निचोड़ के रूप में कहे तो बढ़ता यौन प्रदुषण एवं बढती यौन हिंसा विदेशी पूंजी के बढ़ते आगमन एवं प्रभुत्व वैश्वीकरणवादी बाजार व्यवस्था के फैलाव के साथ आती और बढती रही भोगवादी संस्कृति का अहम् हिस्सा और हथकंडा है। इसे बढ़ावा देने में देश – विदेश के धनाढ्य एवं उच्च वर्ग बड़े स्तर के प्रचार माध्यम और उससे जुड़े विद्वान् बुद्धिजीवी उच्चस्तरीय कलाकार फिल्मकार रचनाकार आदि लगे हुए है। स्वाभाविक बात है कि वैश्वीकरणवादी बाजारवाद के बढ़ते लुट पर साम्राजयी देशो से बनते बढ़ते रहे सम्बन्धो पर रोक व नियंत्रण लगाये बिना यह भोगवादी संस्कृति यौन प्रदूषण व यौन हिंसा को रोकना सम्भव नही है। फिर इस पर रोक लगाने का काम उपरोक्त धनाढ्य एवं उच्च हिस्से नही कर सकते। वे हिस्से स्वंय अपने धन सत्ता के लाभ के लिए उसे बढ़ावा देने में लगे हुए है। इसीलिए उनके द्वारा यौन हिंसा का बहुप्रचारित विरोध दिखावटी एवं निष्प्रभावी विरोध ही साबित होगा। इसके वास्तविक विरोध के लिए जनसाधारण समाज के सवेदनशील और सक्रिय लोगो को ही आगे आना होगा। सामाजिक व्यवस्था को बचाए रखना है और भावी पीढ़ी के सवालों से बचना है तो देश के हर वर्ग के लोगो को जागना होगा, अन्यथा देश गर्त में चला जाएगा।
सुनील दत्ता ‘कबीर ” स्वतंत्रत पत्रकार – समीक्षक

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *