बीबी समझा है क्या ?
“अबे! ए…जा कहाँ रहा है . माल निकाल .” बिस्तर पर पड़े अपने कपडे पहनते हुए वह बोली .
आजतक पुलिसवाले से पैसे मांगने की किसी की हिम्मत नहीं हुई थी .
“तू जानती नहीं है मुझे !” वह लाल आँखें दिखाता हुआ बोला .
“क्या बचा है जानने को ? तेरे जैसे यहाँ रोज आते हैं घाट का पानी पीते हैं दक्षिणा चढाते हैं और चलते बनते हैं . रौब मत झाड ….देख लिया कितना दम है ..अकड़ किसी और को दिखाना …देह बेचती हूँ ईमान नहीं . होगा कहीं का दरोगा …चल एंटी ढीली कर .”
“साली ! बकबक कर रही है …थाने ले जाकर इतना कूटूँगा कि धंधा करने लायक भी नहीं रहेगी !”
“अबे! भीख मांग लूंगी . पर हराम की कमाई नहीं है मेरी जो तू आसानी से ले उड़े.”
“क्या कर लेगी तू …जा नहीं देता पैसे !”
“तेरे ही थाने में बलात्कार की रिपोर्ट लिखवाउंगी तेरे ही खिलाफ और देखती हूँ कौन बचाता है …साले! बीबी समझा है क्या ?”
शब्द मसीहा

