पार्ट-03 – तजुर्बा-ए-अगुअई (योग्य वर की तलाश)
(उज्ज्वल)
योग्य वर की तलाश में प्रखंड कृषि पदाधिकारी (तत्कालीन कोंच और टिकारी के प्रभार में) के बेटे को देखने के लिए टिकारी स्थित उनके आवास पर पहुंचा। बस स्टैंड के समीप आवास था। आवास के बाहर खाली पड़ा ग्राउंड नाली के पानी से भरा था। सुअर के झूंड उसमें स्नान कर रहे थे। कभी-कभार ये झुंड मौका पाकर घरों में भी दाखिल हो जाते थे। खैर, बेटी के लिए रिश्ता करने आया था। बीएओ इतराते नहीं थक रहे थे। एक मकान यहां है। दूसरा गया में भी बना रहे हैं। बेटे के बारे में बताया गया था कि केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक के पद पर उसे नौकरी मिली है। हम अगुआ की मंडली में चार-पांच लोग थे। गदगद मन से लड़के के पिता आगवानी कर रहे थे। हालांकि वे बीच-बीच में आनेवाले कार्यलयीय मैसेज को सार्वजनिक करके यह जता भी रहे थे कि वे अत्यंत व्यस्त और लोकप्रिय अधिकारी हैं। रविवार का दिन होने के बाद उनकी व्यस्तता इस बात का ईशारा कर रही थी कि ये काली कमाई के जुगाड़ में व्यस्त थे। बीच-बीच में हमलोगों से भी बात कर लेते थे। हमलोगों को जानकारी थी कि लड़का घर पर ही है। विशेष आग्रह पर लड़के को बुलाया गया। लड़के की नौकरी की वास्तविकता की जानकारी जुटाने की जिम्मेवारी अपने उपर थी। लड़के से बात करने के लिए मुझे ही आगे कर दिया गया। इधर भौकाल इतना टाइट कर दिया गया था कि केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक से कोई क्या पूछ सकता है। अपने साथ रहे लोगों ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था। अपन ठहरा पत्रकार। रिक्शा चालक से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा और पुलिस सेवा के अधिकारी तक मुखिया से लेकर मुख्यमंत्री तक से बात करने में कोई झिझक तो होती नहीं। कभी जानकार बन कर तो कभी बेवकूफ बन कर जानकारी जुटा लेता हूं। इसमें कभी कोई संकोच नहीं होता है। लड़के से बातचीत शुरू किया। अभी उनकी नौकरी और पदस्थापना से जुड़ी दो-चार बातें ही हुई थीं कि कुछ कारण बता कर होशियार पिता ने अपने बेटे को बीच में ही बुला लिया। इसके बाद उसे कहीं बाहर भेज दिया। अब खुद आ कर हमलोगों के बीच बैठ गये। दांत निपोरते हुए कहा कि बेटे को एक जगह भेजा है। कुछ सामान आया हुआ था। वही लाने गया है। अब बेटे का सवाल पिता से पूछना शुरू किया। शातिर पिता और कृषि पदाधिकारी की इस हरकत ने मेरे शक को यकीन में बदल दिया था कि यहां मामला पूरा फरेब का है। मैंने और बेवकूफ बन कर अब सीधे सवाल पूछना शुरू किया। लड़के का इम्पलायमेंट डिटेल आप उपलब्ध करवा सकेंगे क्या ? जैसे-स्कूल का नाम, किस विषय के शिक्षक हैं और कब से वहां हैं ? कोई इंप्लाई आईडी जो उनके परिचय पत्र में दर्ज हो। अब इतना सुनते ही पिता ने कहा कि यह सब आपके व्हाट्सएप पर भेज देंगे। उसके बाद हमलोगों की वहां से विदाई कर दी गयी। मैंने अगले दो सप्ताह तक उस प्रखंड कृषि पदाधिकारी को फोन और व्हाट्सएप करता रहा कि आप डिटेल मुहैया कराइये। हर बार वे यही कहते कि अभी मीटिंग में हूं। घर पहुंच कर देता हूं। लड़के से मांग कर देता हूं। लेकिन वे जानकारी नहीं दे सके। वे भी भांप चुके थे कि यहां दाल गलनेवाली नहीं है। इस तरह इनसे पीछा छुटा। ऐसे इनके बारे में टिकारी के अपने रिपोर्टर साथी से भी जानकारी जुटायी थी। बड़े तेज-तर्रार अधिकारी में ये शुमार थे।
यह भी कड़वा सच है कि जहां लड़का वाला आसानी से रिश्ता करने को तैयार हो जाता है, उस पर लड़की वाले लोग भी शक करने लगते हैं। इस बार अगुअई के क्रम में औरंगाबाद जिले के देव में पहुंचा था। पिता किसान और अनाज के अढ़तिया थे। एक रसोई गैस वितरण केंद्र में साझीदार भी थे। संयुक्त परिवार था। लड़के के पिता ही मुखिया थे। उन्होंने अपने एक भाई को ईंट भठ्ठा तो अपने एक बेटे को क्रशर चलाने की जिम्मेवारी दे रखी थी। लड़के ने ईमानदारी से कहा-पढ़ने में रुचि नहीं है। स्नातक की पढ़ाई कर ली है। सोचता हूं कि पिता के कारोबार में ही हाथ बंटाउं। सब कुछ बड़े निर्मल भाव से सामने रखा। हमलोगों का स्वागत भी दिल खोल कर किया। लड़की का फोटो और बायोडाटा देखकर तुरंत हामी भी भर दी। शादी के लिए तैयार था। कोई मोल भाव भी नहीं। बस मुस्कराते हुए इतना ही कह रहे थे कि आप जैसे चाहेंगे हमलोग शादी करने को तैयार हैं। ईश्वर की कृपा से किसी चीज की कमी नहीं है। ऐसा संतोषी इंसान आज कम ही मिलता है। यहां कुछ भी छिपाने की कोशिश नहीं की जा रही थी। अब यहां अपने साथ रहे ल़ड़की के पिता को यह सब रास नहीं आ रहा था। वे खुल कर इस लड़के से शादी करने को तैयार नहीं थे। लड़के ने अपनी बातें पहले ही पारदर्शी तरीके से रख दी थी। लड़की के पिता को भी यह बात हजम नहीं हो रही थी कि इतनी आसानी से लड़की की शादी होती है क्या ? अब वे कभी लड़की की मां का हवाला देते कि दामाद तो सरकारी नौकरी वाला ही चाहिए। कभी वे खुद कुछ नुक्ताचीनी करते। इन सब उहापोह के बीच हमलोग दूसरी बार देव पहुंच गये थे। आत्मीयता के साथ हमलोगों का स्वागत किया गया। तनिक भी अहसास नहीं हुआ कि हमलोगों का अभी यहां कोई संबंध नहीं हुआ है। जितनी देर रहे, घर का बना कुछ-न-कुछ परोसा जाता ही रहा। देव बाजार से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित उनके गांव में भी गये। वहां भी दिल खोलकर स्वागत किया गया। किसी भी नौकरी करनेवालों के पास न तो इतना संसाधन हेा सकता है और न ही ऐसी सुविधाएं। यह कारोबारी परिवार जितना हर दिन का करोबार कर रहा था एक नौकरी वाले परिवार को साल भर में भी इकठ्ठे रूप में उतना पैसा देखने को शायद नहीं मिले। हमलोगों को इस परिवार से अब कुछ भी पूछना शेष नहीं रह गया था। अब लड़की के पिता को हामी भरनी थी। लड़के वाले का फोन आता रहा। इधर, इस बार लड़की वालों की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। कुल मिला कर लड़के वालों को संदेश मिल गया कि उनके यहां हमलोग रिश्ता नहीं करेंगे। इस बार मुझे अच्छा नहीं लगा।
क्रमश :

