क्यों कहते हो, मुल्क बीमार है?? तुम्हे मालूम नहीं, अभी चुनाव है…
( नितांत निजी दुःख से अभिप्रेत विचार हैं )
( धीरज सिंह )
क्यों कहते हो,
मुल्क बीमार है??
तुम्हे मालूम नहीं,
अभी चुनाव है…
हर जान कीमती है,
फकत सच है लेकिन…
मगर भींड के भी मायने हैं,
ये लोकतंत्र की दरकार है….
अपने मुस्तकबिल को,
अभी तय होने दो….
ये जम्हूरियत ही तो है,
जो सत्ता का पतवार है….
उन्हें खूब मालूम है,
तुम्हारे गम और खयालात…
उन्हें बेशक इल्म है,
क्या हैं मुल्क के हालात….
मगर वो जानते हैं,
तुम्हारी कीमत के मायने…
रखते हैं दुनियादारी के,
सबसे सटीक आइने….
वो समझते है कैसे,
मोड़ा जाता है हर बात को…
मत समझाओ उनको,
किसी के जज्बात को…
खूब समझते हैं वो तुमको..
खूब जानते हैं वो तुमको..
तुम वही हो ना..
जो एक नारे से ही बदल जाते हो…
एक भाषण पर रो देते हो,
खून में जब चाहे वो,
उबाल ला देते हैं तेरे…
सड़कों पर एक इशारे से,
बवाल ला देते हैं…
मुर्गे पर बहक जाते हो,
दारू पर चहक जाते हो,
वो जैसा चाहते हैं, वैसा सोचवा रहे,
वो जैसा कहते हैं, वैसा बोलवा रहे,
उनका सच ही तुम्हारा सच है,
तुम्हारे दिल के जज़्बात से….
तुम्हारे दिमाग से खेल रहे हैं वो…
इस खेल में,
तुम खिलाड़ी भी नहीं हो…
सिर्फ दर्शक हो…
और वो पूरा खेल हैं…
और ये खेल तुमने चुना है…
(लेखक- धीरज सिंह मऊ में श्रम प्रवर्तन अधिकारी हैं)
@dheerajpoetry

