रचनाकार

कोई भूखा न सोए वतन में कभी, अन्नदाता कहते, धन्य हूं सम्मान पाकर

कामनी गुप्ता

दो बैलों की जोड़ी लेकर,
चला मेहनत का सफ़र।
किसान को फुर्सत कहां,
जो सोच करे इधर उधर।
इन खेत खलिहानों में जब,
लहराती है फसलें अक्सर।
दिल को सुकून मिलता है,
रंग लाती मेहनत जीभर।
नीले सींग जब हिलें बैलों के,
याद आता है आसमां हमसफ़र।
भूरा या गोरा, रंगों का क्या है,
हल एक सामान जोतते दिनभर।
मौसम भी मेरा हौंसला न डिगाए,
सब सहता मैं अटल कृषक वर्षभर।
मेरी शान और अभिमान मेरे बैल,
मैं कर्ज चुकाता अन्न उपजाकर।
कोई भूखा न सोए वतन में कभी,
अन्नदाता कहते, धन्य हूं सम्मान पाकर।

लेखिका कामनी गुप्ता जम्मू की रहने वाली हैं।

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