सुबह सबेरे : वो मेरा तुतला के कहना, अम्मा मुझको गोद में ले लो
रह जाती है सारी बातें, खो जाती हैं कहीं सुधियाँ सारी
वो मेरा तुतला के कहना, अम्मा मुझको गोद में ले लो
कहाँ लौटकर आते हैं वे
चने, चबैने के दिन बोलो
वो पल्लू की छाँव सुहानी
लौट सकी कभी क्या बोलो
वही रोटियाँ , वही मुंडेरें
फूल भी शायद वैसे ही हैं
कौन कहे किन्तु अब मुझसे
कान्हा माटी में मत खेलो
रह जाती है सारी बातें , खो जाती हैं कहीं सुधियाँ सारी
वो मेरा तुतला के कहना, अम्मा मुझको गोद में ले लो
क्यों जाता है बचपन बोलो
क्यों आती है ये मुई जवानी
क्यों हो जाती है माँ बुढ़िया
अरे! दिशाओं कुछ तो बोलो
बढ़ा गयी जीवनपथ पर वह
छुड़ा के अपनी प्यारी उंगली
मैं शिशु तेरा तुझे रोज पुकारूं
कभी जरा अम्बर से बोलो
रह जाती है सारी बातें, खो जाती हैं कहीं सुधियाँ सारी
वो मेरा तुतला के कहना, अम्मा मुझको गोद में ले लो
कहाँ खो गयी हैं आवाजें
किसको माई पुकारूं बोलो
छाँव तले जिया जलता है
मलहम कौन लगाए बोलो
रोम-रोम यही कहे है पागल
अब इस दुनिया से घबराकर
प्रीत तुम्हारी भी झूठी क्या
मेरी अम्मा तुम कुछ तो बोलो
रह जाती है सारी बातें, खो जाती हैं कहीं सुधियाँ सारी
वो मेरा तुतला के कहना, अम्मा मुझको गोद में ले लो
लेखक शब्द मसीहा दिल्ली में रेलवे विभाग में इन्जीनियर हैं।
