सादगी के प्रतिमूर्ति थे पूर्वांचल के कर्मयोगी डॉ. ईश्वरदत्त उपाध्याय

पूर्वांचल के कर्मयोगी चिकित्सक, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, राजनेता एवं समाज सेवी डॉ. ईश्वरदत्त उपाध्याय अब हमारे बीच नहीं रहे। गत 26 अप्रैल को प्रातः 5 बजे आपका अपने पैतृक गॉंव पाउस, दोहरीघाट, मऊ में हृदयाघात से निधन हो गया। डॉ. उपाध्याय का जन्म एक अत्यंत साधारण ब्राह्मण परिवार में 18 मार्च सन् 1939 ईस्वी में पाउस गॉंव में हुआ था। आपके पिता का नाम पंडित इंद्रदेव उपाध्याय एवं माता का नाम श्रीमती राजवती देवी था।पिता एक अध्यापक थे।अपनी 6 बहनों के बीच डॉ. उपाध्याय अकेले भाई थे। इनके चाचा स्व.रामनरेश उपाध्याय का इनका ऊपर विशेष प्रभाव पड़ा था और उन्हीं की प्रेरणा से उन्होनें मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी की और उसमें उनका चयन हो गया।उन्होंने एमबीबीएस की परीक्षा स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की और उनका चयन राजकीय चिकित्सक के रूप में हो गया। 1963 से 1967 तक वे बड़ागाँव, बसनी, वाराणसी में मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्यरत रहे और फिर उन्हें चमोली का डिप्टी सीएमओ बनाया गया।

एक चिकित्सक के लिए उक्त उपलब्धियाँ पर्याप्त मानी जा सकती हैं किंतु डॉ. उपाध्याय सरकारी नौकरी से संतुष्ट नहीं हुए।परिवार में वे अकेले पुत्र थे और उनके क्षेत्र में उनदिनों चिकित्सकीय सुविधाओं का नितांत अभाव था। गरीब आदमी चिकित्सा-सुविधाओं से वंचित था। डॉ. उपाध्याय ने सरकारी नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया और वे त्यागपत्र देकर अपने गॉंव चले आए। गॉंव में ही उन्होंने प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू कर दी एवं अत्यंत कम शुल्क के साथ वे अपने क्षेत्र के मरीजों का इलाज़ करने लगे।रोग की सटीक पहचान एवं उसका सटीक निदान मानो उन्हें सिद्ध था।बिना किसी खर्चीले परीक्षण के ही वे सहजता से रोगियों का उपचार कर देते थे और धीरे-धीरे उनकी ख्याति पूरे पूर्वांचल में फैल गई। लोग उन्हें डॉक्टर के रूप में देवता मानने लगे। उन्होंने बाद में दोहरीघाट में एक छोटा-सा अस्पताल भी खोल दिया जिसमें बहुत ही कम खर्च पर मरीज़ों का इलाज होता था। कठिन से कठिन रोग उनके उपचार से छूमंतर हो जाता था। उनके क्षेत्र के लोगों ने उनपर स्नेहवश दबाव डाला कि वे राजनीति में भी सक्रिय भागीदारी निभाएँ। वे पहले जिला पंचायत सदस्य चुने गए और बाद में दो बार, क्रमशः 1982 एवं 1987 में दोहरीघाट ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए। वे प्रदेश ब्लॉक प्रमुख संघ के महामंत्री भी थे। वे इंडियन मेडिकल एसोसियन के दोहरीघाट-बड़हलगंज संभाग के अध्यक्ष भी थे।अखिल भारतीय पंचायत राज सम्मेलन में उन्होंने प्रदेश का प्रतिनिधित्व भी किया था। भाजपा द्वारा उन्हें सन 1991 में नत्थूपुर विधानसभा के लिए टिकट भी दिया गया था और वे विधायक पद के लिए चुनाव भी लड़े थे। 23 वर्षों तक वे क्षेत्रीय समिति के सदस्य रहे। उन्हें शीघ्र ही महसूस हुआ कि राजनेता के लिए जिन आयातित गुणों की आवश्यकता होती है वे उनमें नहीं थे। वे अपने सिद्धांतों के साथ कोई समझौता कर ही नहीं सकते थे। ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा उनके जीवन के मूल्य थे, जिन्हें वे छोड़ नहीं सकते थे।अतः उन्होंने सक्रिय राजनीति से अपने आप को अलग कर लिया।उन्होंने अपना जीवन जनता की सेवा के लिए ही पूरी तरह अर्पित कर दिया। वे मलयालम शिक्षण संस्थान के अध्यक्ष भी थे। जीवन की अंतिम साँस तक वे मरीज़ों का उपचार करते रहे। लेकिन महाकाल के आगे अंततः उन्हें समर्पण करना पड़ा। उनके जाने से चिकित्सा जगत की एक बड़ी क्षति हुई है।उनके क्षेत्र के गरीब लोगों के लिए डॉ. उपाध्याय साक्षात धनवंतरी ही थे जिसकी क्षतिपूर्ति असंभव है।

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