समाज की पाबंदी लांघ मऊ की साहिबा रच रही इतिहास
मऊ। ओ साहिबा, ओ साहिबा, ओ साहिबा, ओ साहिबा, मिलेंगे तुमसे तो बताएंगें की कितना प्यार है हमें, ओ साहिबा ओ साहिबा। अपने समय का यह मशहूर गाना भले ही प्यार मुहब्बत के नाम पर फिल्माया गया था और देश सहित विदेशों में मशहूर हुआ था, लेकिन ओ साहिबा के इस बोल को आज अपने दृढ़ इच्छाशक्ति व कार्य के प्रति प्रेम की लगन कर मऊ का नाम रोशन कर रही हैं “साहिबा बानो” ये नाम आपको किसी शाह की साहिबा की याद दिला सकता है पर जिस साहिबा की बात मैं करने जा रहा हूँ वो किसी किले या शाह के घर की नहीं है और नाहीं गाने कि बोल बाली साहिबा कि यह साहिबा है मेरे और आपके शहर “अपना मऊ” की साहिबा की। जो मऊ ज़िले में दोहरीघाट विकास खण्ड की ग्राम पंचायत भैरवपुर में रहने वाले एक ग़रीब मुस्लिम परिवार की बेटी है। जिसपर न जाने कितने पहरे थे, नजाने कितनी पाबंदियाँ थी यहाँ तक के इन पाबंदियों ने उसका स्कूल तक छीन लिया। लेकिन मन में कुछ अलग करने का जज्बा उसके हौसलों को पंख देने से रोक न सके।
मात्र कक्षा बारहवीं तक ही पढ़ सकी साहिबा का बस एक सपना है कि लोग उसको उसके काम से जाने उसके मज़हब से नहीं। और इसी मकसद की तलाश में साहिबा 06 अप्रेल,2017 को अपने गाँव से मऊ जनपद मुख्यालय पर, अपने गाँव की आशा दीदी के साथ आ गई। यहाँ उसे पांच दिवसीय सी.एल.टी.एस. ट्रेनिग में भाग लेना था। अलग करने का जुनून संजोये साहिबा को ट्रेनिग के तीसरे दिन अपना लक्ष्य मिल गया था, एक स्वस्थ समाज के निर्माण को साहिबा ने अपना लक्ष्य बना लिया। और फ़िर क्या था उसकी हर सांस बस इसी मकसद के लिए चलने लगी।
साहिबा ने ट्रेनिग लेनेके बाद चार गांवों में ट्रिगर किया जिसमें से दो गाँव आज खुले में शौच से मुक्त भी हो गये हैं। साहिबा आज भी जब अपने पुराने दिनों के बारे में बात करती है तो भावुक हो जाती है। एक वक्त की दिशाहीनता आज दिशावान हो गई है।केवल अपने घर की साहिबा आज पूरे जनपद की साहिबा बन गई है। साहिबा बानो अब सामाजिक कार्यों के प्रति पूरी मेहनत और लगन के साथ लगी हुई है। उसका जुनून सिर्फ कैसे समाज के उस व्यवस्था को बदला जाए जिसके प्रति समाज जागरुक नहीं हो रहा है। कैसे लोग खुले से शौच मुक्त हों यही उसका मकसद है।साहिबा के बारे में ह लाईन बिल्कुल फिट बैठती है, मंज़िल मिल ही जाएगी, ज़रा भटक कर ही सही, रंज़ तो वो करें जो घर से निकले ही नहीं।

