ब्रिगेडियर उस्मान का 70वां शहादत दिवस मनाया गया
घोसी/मऊ। तहसील क्षेत्र के बीबीपुर गांव के रहने वाले ब्रिगेडियर उस्मान का 70 वाँ शहादत दिवस इलाके की जनता मना रही है । ब्रिगेडियर उस्मान ने भारत पाकिस्तान युद् के दौरान पाकिस्तान फौज के दात खट्टे करते हुए बीरगति को प्राप्त किया, तीन जुलाई 1948 को नौसेरा में पाकिस्तानी फौजो से लोहा लेते हुए यह बीर सपूत शहीद हुआ और तब से ही इसे नौसेरा का शेर कहा जाने लगा। ब्रिगेडियर उस्मान का जन्म बीबीपुर गांव में 1913 में मुहम्मद फारुख के घर हुआ था, उस समय इस परिवार की गिनती इलाके के बडे जमीदार घरानो में होती थी। जमीदारी और शानो शौकत में पलने के बाबजूद भी उस्मान के दिल में देशभक्ति के लिए एक अदम्य उत्तसाह था । इनके पिता फारुख बडी कोतवाली वाराणासी जनपद मे कोतवाल हुआ करते थे। उनके शौर्य और वीरता का प्रदर्शन देखते हुए उस समय के अंग्रेज लेफ्टिनेन्ट ने उन्हे खान बहादूर के खिताब से नवाजा था। मुहम्मद फारुख के तीन बेटे थे जिसमे सबसे बडा बेटा मुहम्मद सुभान टाइम आफ इन्डिया के उप सम्पादक बने, तो छोटे भाई मुम्मद गुफरान ने फोर्स में जाकर ब्रिगेडियर के ओहदे तक पहूँचे, और दूसरे नम्बर पर ब्रिगेडियर उस्मान थे जिनकी शहादत को देश आज भी सलाम करता है…।
सन 1947 में आजादी के समय में मजहबी आधार पर देश विभाजन के समय ब्रिगेडियर उस्मान वरिष्ठ सैन्य अधिकारी थे उसी समय भारत में रहने के इच्छुक तमाम मुस्लिम सैन्य अधिकारियो को बडे ओहदे का लालच दिखाकर पाकिस्तानी सेना में शामिल किया जा रहा था। यह पेशकश ब्रिगेडियर उस्मान के पास भी आयी लेकिन धर्म और मातृभूमि को अपनाने के सवाल पर उन्होने मातृभूमि को ऊचाँ स्थान देते हुए पाकिस्तान की इस पेशकश को ठुकरा दिया। जिस पाकिस्तानी परस्तो ने उन्हे काफिर कहते हुए उन पर पचास हजार का इनाम भी घोषित किया । ब्रिगेडियर उस्मान के इस साहसिक कार्य कदम से मुस्लिम सैन्य अधिकारियो के पाकिस्तान जाने का सिलसिला ही रुक गया, और ढाई सौ मुस्लिम सैन्य अधिकारी सेना में बने रहे। और समय आने पर अपनी देश भक्ति का परिचय दिया।
देश विभाजन के बाद पैरा ब्रिगेड के प्रथम कमान्डर का पद सम्मभालने वाले इस ब्रिगेडियर का देश भक्ति का जज्बा व मातृभूमि के सच्चे सपूत का असली रुप सन 1948 में देखने को मिला जब पाकिस्तानी फौजो द्वारा कबाइली वेश में भारतीय सैन्य चौकियो पर कब्जा जमाना शुरु कर दिया , लगभग डेढ़ लाख की तादात में कबायली नियनत्रण रेखा सगंड को पार करते हुए नौसेरा पहाडी तक आ पहूँचे थे उस समय नौसेरा पहाडी कि सुरक्षा का जिम्मा राजपूत रेजिमेन्ट का था लेकिन स्थित अतिसंवेदन शील देखते हुए पैराब्रिगेड के सैनिको ने ब्रिगेडियर उस्मान के नेतृत्व में राजपूत रेजिमेन्ट के सहयोग से अपने अदम्य साहस व वीरता का परिचय देते हुए पाक कबायलियो को नौशेरा पहाडी से खदेड दिया।
भारतीय सेना ने झंगड व नौसेरा पर कब्जा तो कर लिया पर पाकिस्तानी सेना द्वारा विछायी गयी बारुदी सुरगं बिस्फोट व गोलाबारी से अपने इस वीर सेनानायक को बचा न सकी, और तीन जुलाई को सन 1948 का वह दिन भारतीय सेना के लिए काला दिन साबित हुआ जिसमें अपने अदम्य साहस और पराक्रम से अपनी मातृभूमि को दुश्मनो से निजात दिलाने वाले ब्रिगेडियर उस्मान को खो दिया। ब्रिगेडियर के इस अदम्भ साहस के लिए नौशेरा का शेर) के शेर के खिताब से नवाजा गया। शहादत के पश्चात भारतीय सेना द्वारा इस वीर सपूत को महावीर चक्र मरणोपरान्त से सम्मानित किया गया । जिनकी याद में आज उनके घर पर 70 वाँ शहादत दिवस मनाया जा रहा है । परंतु इतने सालों के बीत जाने के बाद भी अमर शहीद की पवित्र जन्म भूमि शासन ,प्रशासन व जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का शिकार झेलता रहा है।

