रचनाकार

बाहर मत जाइए

( सूबेदार पाण्डेय कवि आत्मानंद )
मै भोजन के निवालों की कथा लिखता हूंं, आंख के आंसू जिगर, के दर्द पांवों के छालों की कथा लिखता हूं। रास्ते कठिन ‌हैं‍ मंजिलें दूर मगर, जोश हिम्मत की बगावत‌ की कथा लिखता हूं।


चल पड़े दो कदम राह अंजान पर,
मंजिलें ना मिले फिर भी चलता हूं मै ।
झेली महामारी बेबसी की दुश्वारियां,
लाक डाउन की पीड़ा को लिखता हूं मैं।
पास में भूख ‌है किन्तु भोजन नहीं,
दूर जाना है पर कोई साधन नहीं।
क्या पता मंजिलें अब ‌मिले न मिले,
बात कहनी जुबां ‌से अब‌ हिले ना‌ हिले।
देखना ‌है‌‌ मेरा‌ हश्र‌‌ तुम‌ देख‌ लो,
बात मतलब‌ की‌ है तुम‌ इसे सोच‌ लो ।
गर समझदार हो तो समझ जाइए
प्यार से फिर शरारत को समझाइये।
घर में रहना है बेहतर ये समझो जनाब,
बाहर मत जाइए,‌ बाहर मत जाइए।
छूत का रोग है ये करोना बली,
इससे छूटा नहीं कोई कोना गली।
ना मिली कोई अब तक दवाई‌ सनम,
मत करो खुद से तुम ‌बेवफाई सनम।
दूरियां जो अगर तुम बना‌ पाओगे,
लाक‌डाउन से ही तुम हरा‌ पाओगे।
खुद का‌ मरना‌‌ तुम्हे आज‌ मंजूर है,
खो के अपनों को तुम आज पछताओगे।
करता बिनती सभी से ‌झुका करके सिर,
बाहर मत जाइए ‌बाहर‌ मत जाइये।।


रचनाकार—–सूबेदार पाण्डेय कवि आत्मानंद जमसार सिंधोरा वाराणसी221208
मोबाइल 6387407266

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