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जीवन को उत्तरायण की ओर ले चलने के संकल्प का प्रेरक पर्व है मकर संक्रान्ति

मऊ। मकर संक्रांति पर्व के उपलक्ष्य में आर्यसमाज मऊ में यज्ञ किया गया एवं यज्ञ की महत्ता तथा आज के पर्व का महत्व बताया गया।
प्रभु के नियम से हमारी पृथिवी सूर्य को केन्द्र बनाकर उसकी कुछ लम्बी वर्तुलाकार परिधि पर निरन्तर परिक्रमा कर रही है। वेद व विज्ञान के इस दृष्टिकोण को साम्प्रदायिक ईसाई व मुस्लिम लोग न मानकर अपनी अज्ञानता का ही परिचय देते रहते हैं। वे लोग तो इसके विपरीत सूर्य, पृथिवी को केन्द्र बनाकर परिक्रमा करता है ऐसा मानते हैं। वहां पर यदि उनमें से गैलिलियो जैसा कोई वैज्ञानिक विज्ञान के प्रकाश में सत्य कह देता है तो उन्हें कठोर यातनायें व मृत्यु दण्ड भी दे दिया जाता है। साम्प्रदायिक लोगों की इस स्थिति पर कभी एक उर्दू कवि अकबर ने चुटकी ली थी कि पुरसुकूँ थी जिन्दगी, जब आसमाँ गर्दिश में था। जब से घूमी है जमीं, हर आदमी चक्कर में है। यह पृथिवी जितने समय में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है उतने समय को एक सौर वर्ष कहा जाता है। सूर्य की जिस वर्तुलाकार परिधि पर पृथिवी परिभ्रमण करती है उस घेरे के १२ भाग कल्पित कर लिये गये हैं। उन १२ भागों के नाम मेष, वृष,मिथुन व कर्क आदि रखे गये हैं। ये नाम घेरे रूप क्रान्तिवृत्त के १२ स्थानों पर आकाशस्थ नक्षत्रपुञ्जों से मिलकर बनी हुई, उनसे कुछ मिलती जुलती आकृति वाले पदार्थों के नाम पर रख लिये गये हैं। जैसे कि नक्षत्रपुञ्जों से बनी हुई कोई आकृति यदि मकर से मिल रही है तो उस भाग को मकर कहते हैं। इन आकृतियों वाले १२ भागों को राशि कहते हैं। जब पृथिवी इस क्रान्तिवृत्त पर एक राशि से दूसरी राशि में गति करती है तब उसे संक्रान्ति कहते हैं। इसमें मकर राशि की संक्रान्ति होने से यह पर्व मकर संक्रान्ति कहलाता है।मकर संक्रान्ति होते ही पृथिवीवासियों को सूर्य ६ मास तक उत्तर की ओर उदय होता हुआ दृष्टिगोचर होने लगता है। ६ मास के इस काल को उत्तरायण काल बोलते हैं। इसी प्रकार कर्क राशि की संक्रान्ति से दक्षिणायन आरम्भ हो जाता है। सूर्य के प्रकाशाधिक्य के कारण उत्तरायण को महत्त्व प्राप्त है।मृत्युञ्जयी भीष्म पितामह ने अपने देह का त्याग करने के लिये उत्तरायण के आगमन तक प्रतीक्षा की थी। उनके समकालीन महात्मा श्रृंगी जो कि कुछ वर्ष पूर्व ब्रह्मचारी कृष्णदत्त के रूप में जन्मे थे उनके मतानुसार भीष्म पितामह शरशय्या पर आसीन होने के पश्चात् १ वर्ष ४ दिन तक जीवित रहे। इतने समय तक तब वे कौन से उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे ? उत्तरायण काल के छः मास में सूर्य का राज्य विशेष होता है , इसलिये उत्तरायण प्रकाश है, ज्ञान है। सूर्य के दो प्रकार के स्वरूप हैं – एक लौकिक सूर्य है, इसमें परमेश्वर ने जितने दिव्य गुण रख दिये हैं उतने हैं और दूसरा सूर्य वेद है। वेद ज्ञान रूपी सूर्य कहलाता है।इस सूर्य को भी परमात्मा रूप सूर्य ने ही प्रकट किया है। हमारे जीवन का वही भाग धन्य है कि जब आत्मा में ज्ञान का प्रकाश प्रकट हो अन्यथा तो इसकी गठरी खाली ही है। इस ज्ञान रूप सूर्य का प्रकाश योगियों व अन्यों को भी कई प्रकार से हुआ करता है। तद्यथा तप से ज्ञान उत्पन्न होता है। कष्टों को सहन करना तप है। अपने किसी भी लक्ष्य जैसे कि भगवान् का उज्ज्वल प्रकाश प्राप्त करना । भगवान् को प्राप्त करने के अपने लक्ष्य की ओर गम्भीरता से चलने वाला उपासक तप के द्वारा आत्मा में ऐसी तरंग उत्पन्न कर लेता है कि वह तरंग अपने मार्ग में सामने आने वाले पाप के बड़े बड़े ढ़ेरों को धक्का देती चली जाती है और दुर्वासनाओं के जाल में फंसे मनुष्य को इससे पहले वस्तु का वास्तविक रूप ही नहीं दीखता था पर अब तो उसके सामने जीवन का लक्ष्य सदा नाचा करता है,यह ज्ञान के सूर्य का उदय है। इस प्रकार तप स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान आदि साधनों से ज्ञान रूप सूर्य का उदय होना उत्तरायण है। सूर्य का प्रकाश हमारे जीवन के लिये बहुत आवश्यक है किन्तु अध्यात्म के क्षेत्र में ज्ञान रूपी सूर्य का आत्मा से सीधा सम्बन्ध है। न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ज्ञान के सदृश पवित्र कुछ नहीं है और ऋते ज्ञानान्न मुक्ति: ज्ञान के विना मुक्ति नहीं है। इस ज्ञान के प्रकाश से जीवन उत्तरायण की ओर अग्रसर होता जाता है। ऐसे जीवन का धनी जब भी शरीर छोड़ता है तब उसे प्रभु की व्यवस्था से तद्विशिष्ट गर्भ अगले उत्तम जीवन के लिये खींचता है अथवा मुक्ति का पात्र होने पर मोक्ष धन को प्राप्त करता है।
अत: सृष्टि की मकर संक्रान्ति रूप घटना से प्रेरित होकर जीवन के उत्तरायण की ओर हम भी संक्रान्ति करें। यह संकल्प ग्रहण करना ही पर्व की पर्वता है।।
मकर संक्रांति यज्ञ में प्रधान उदयप्रताप आर्य, रमेश चंद्र, सुमित राय, अजय आर्य, मुरली वर्मा, सर्वेश राय, प्रशांत रत्नम् सिंह, राजा आनंद ज्योति सिंह, तपन कुमार सेन, दीपू सिंह, विश्वा गुप्ता, राहुल उपाध्याय, अरविंद आर्य, राहुल सिंह महेश गुप्ता, संतोष आर्य, जितेंद्र प्रताप वर्मा, राजेश वर्मा, आयुष्मान वर्मा, परमात्मा पांडेय, ओमप्रकाश गुप्त, रमाशंकर आर्य, बब्बन प्रसाद वर्मा, प्रहलाद वर्मा, अशोक आर्य, सुरेंद्र आर्य, अरविंद कुमार राय, राजेंद्र प्रताप आर्य, बृजेश सिंह, छेदीराम गुप्त, मनीष आर्य ज्योतिष सिंह आदि उपस्थित रहे।

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