आप को इस बुजुर्ग फक्कड़ पत्रकार का समर्थन क्यों करना चाहिए..?

मित्रों!
किसी के समर्थन और विरोध का एक वाजिब, विधिक और मौलिक कारण होना चाहिए. जिसके करने से, जिसके होने से, आप की आत्मा और उसकी स्वाभाविक आवाज़ प्रतिध्वनित हो, जिसकी स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्ति से, प्रकृति के साथ न्याय होता लगे.
दरअसल इंसानियत का विस्तार और तकाजा इस बात पर निर्भर है कि- सभ्यता की विकास-यात्रा में, एक सभ्य समाज सदैव, प्रकृति विरूद्ध, न्याय विरूद्ध और नैसर्गिक न्याय सिद्धांतों के विरुद्ध होने वाले किसी भी दुष्कृत्य को जाग्रत समाज की भांति हर काल-परिवेश में विरोध और आलोचना किया है. यह विरोध,आलोचना और समर्थन केवल विरोध और समर्थन करने के लिए नहीं होता है, बल्कि इसके द्वारा एक जवाबदेह, समावेशी,लोकतांत्रिक,नैसर्गिक न्यायविधि और इसके मौलिक समाज-सिद्धांतों की स्थापना होती है और इस उपक्रम से एक सुसंस्कारित, सभ्य समाज की जड़े गहरी भी होती हैं.
आजमगढ़ के मूल निवासी एसके दत्ता जिसने 65 बरस के जीवन सफ़र में से लगभग 40 बरस लोकहित, समाजहित और इसके मूल्यों की स्थापना के लिए दिया. चार दशक की पत्रकारिता और फोटो जर्नलिज्म से आजमगढ़ को एक नई पहचान दी. एक नई पौध तैयार की. एक आंचलिक चितेरा के रूप में अपनी माटी और मातृभूमि के यशवृद्ध के लिए लगे रहे, जबकि इस अदभुत प्रतिभा के पलायन और संभावनाओं के लिए देश और दुनिया में बहुत स्पेस तब भी थे, जब वह नौजवान थे और आज भी हैं जब वे जीवन की सन्ध्या की ओर बढ़ चलें हैं. क्योंकि इस फोटो-आर्टिस्ट के भीतर आजमगढ़ सदैव धड़कता रहा. मुफलिसी और यायावरी में माटी के प्रति जिम्मेदारी का बोध सदैव रहा. यही कारण है कि आजमगढ़ फोटो जर्नलिज्म की आधारशिला रखने वाले इस कलमकार ने, अपने लिए फक्कड़ जीवन का ही वरण किया. जबकि इन चार दशक में अनेक अवसर, नौकरशाहों और राजनेताओं ने दिया कि- ‘दत्ता! तुम अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर लो’ लेकिन दत्ता को वह सलाह न तब सुहाया और न अब, चार दशक बाद. क्यों दत्ता को जीवन का सारतत्व मालूम है कि- उन्हें बस एक क़ब्र भर का ही टुकड़ा चाहिए, जो एक जाग्रत समाज से मिल ही जाएगा. इसलिए समाज का बनना और उसका लोकतांत्रिक होना बेहद जरूरी है और उसके लिए दत्ता जैसे लोगों को अपने जीवन की कुर्बानी और त्याग समर्पण देना ही होगा. जो इस जनपक्षीय पत्रकार ने दिया और दे रहा है. लेकिन उसके ऊपर यदि कोई आसन्न संकट हो, मुश्किल हो, उसके साथ अन्याय हो तो, इसकी लड़ाई भी, बस उसकी भर नहीं होती है बल्कि एक जीवित समाज की हो जाती है. और समाज को उसके जीवित होने का प्रमाण भी देना होता है. इस लिए एसके दत्ता का आप खुलकर समर्थन करें या विरोध करें. लेकिन अपने जीवित रहने का प्रमाण-पत्र जरूर दें. कहीं आने वाली पीढ़ियाँ हमको-आप को, चलती- फिरती लाश न समझ लें. इस लिए आगें आइएं:-
एसके दत्ता को आप समर्थन क्यों चाहिए:-
1 -क्योंकि एक जनवादी पत्रकार के साथ प्रशासन ने अन्याय किया है.
2- क्यों कि एक चार दशक की पत्रकारिता का सिला उनके आजीविका का एकमात्र आधार आफिस को जमीदोज़ करके दिया गया है.
3- क्यों कि नैसर्गिक न्याय विधि की सरेआम हत्या हुई है, बिना दत्ता को सुनवाई का अवसर दिए एक पक्षीय कार्रवाई कर दी गई है.
4- क्यों कि समाज में एक बार फिर तानाशाही ने लोकतांत्रिक ढांचा को रौंदा है.
5- क्यों कि एक बुजुर्ग पत्रकार के आश्रित परिवार -पत्नी और तीन -तीन लड़कियों के पेट पालने और जीवन निर्वाह का संकट है.
6- क्यों कि समाज में फिर कोई दत्ता बनने और इस फक्कड़ जीवन का वरण करने की हिम्मत कर सके.
7- क्यों कि हम यह साबित कर सकें कि हम एक न्यायप्रिय और लोकतांत्रिक जमी की पैदाइश हैं. जिंदा लाश भर नहीं हैं.
9- क्यों कि फिर कोई व्यवस्था और नौकरशाह इस तरह की स्थापित मानक और समाजवादी मूल्यों को ध्वस्त करने से पहले हजार बार सोचे.
10- क्यों कि कोई नौकरशाही मदांध और निरकुंश होकर किसी व्यापक समाज का बर्बर और अमानवीय क्षति कारित न करे सके..

सादर, संयोजक जर्नलिस्ट क्लब.

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