खास-मेहमान

शब्द मसीहा : कहानी नए पापा

“आज जरा ठीक से रहना . बारह साल के हो गए हो . मुझे कोई बदतमीजी नहीं चाहिए .आज वो आ रहे हैं .”

“कौन वो ? नया बाप ! मुझे मौसी ने सब बता दिया है . बारह साल का हूँ कोई बच्चा नहीं हूँ मैं . नहीं चाहिए मुझे नया बाप .”

तभी दरवाजे की घंटी बजी . दरवाजा खोला तो सामने विमल खड़ा था . हाथों में फूल थे . गिफ्ट थे और एक किताब .

“हेल्लो ! तुम रोहन हो न ?” विमल ने पूछा .

“हाँ, मैं रोहन हूँ . तुम मेरे नए बाप हो न . नहीं चाहिए मुझे नया बाप .”

“क्यों बेटा ! क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि तुम बाहर घूमो , जब कोई चीज मांगो तो तुम्हें मिले या तुम्हारे साथ कोई दोस्त हो . हम आपके दोस्त तो बन सकते हैं . रोहन ! ये सब मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ बेटे !”

“काहे का बेटा ? अगर कुछ भी टूट गया तो शराब पीकर मुझे मारोगे और ये माँ भी नहीं बचाएगी ….पहले भी नहीं बचाती थी .”

फटाक से विमल ने एक खिलौना जमीन पर दे मारा. खिलौना चूर-चूर हो गया .

“देखा दोस्त ! खिलौने तो टूटने के लिए ही होते हैं . पर यहाँ गंद हो गया है अब . मैं इसे साफ़ कर देता हूँ , नहीं तो माँ को अच्छा नहीं लगेगा . ”

विमल ने टूटे खिलौने के टुकड़े इकठ्ठा शुरू कर दिए . रोहन ने दूसरा खिलौना उठाया और जमीन पर दे मारा .

“हा हा हा ….अच्छा किया रोहन ! जब मैं हूँ तो अब खिलौने की क्या जरुरत है ?”

विमल ने हँसते हुए फूल रोहन के हाथों में सौंप दिए .

“पर ये तो आप माँ के लिए लाये हो . चलो …हम मिलकर माँ की मदद करते हैं .” उसने माँ को फूल देते हुए कहा .

“तो आपको ये दोस्त पसंद है !”

“आप तो मेरे नए पापा हैं . अच्छे पापा .”

रोहन घुटनों पर बैठते हुए विमल के साथ टूटे खिलौने के टुकड़े उठा रहा था .

लेखक शब्द मसीहा ईं. केदारनाथ रेलवे दिल्ली में हैं

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