अपना भारत

स्वागतम भारत! स्वाधीनता दिवस@75

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

आइए धूमधाम से स्वाधीनता दिवस मनाएं। विविधता, एकता और अखंडता, प्रेम और भाईचारगी की खूबसूरती में अद्भुत हमारा देश भारत वर्ष अपनी आज़ादी की 75वीं वर्षगाँठ जब भोर की किरणों के साथ स्वाधीनता दिवस मना रहा है तो यह सभी भारतीयों के लिए अमृत अनुभव है. हमारी आज़ादी हमारे स्वराज और हमारी सार्वभौम सोच से पुष्पित-पल्वित हो रही है. अडिग पर्वतमाला की निराली छवि, नदियों की श्वेत धार अपनी निरंतरता में जिस प्रकार बह रहे हैं और आकाश में पंक्षी कलरव करते भारत का यशगान कर आहे हैं उन्हें भी सुनें और अनुभव करें कि उनकी इस भूमि के साथ बहने और कहने की अपनी नाद क्या है? लाल किले के प्राचीर से हमारे प्रधान मंत्री का इस स्वर्णिम छटाओं के बीच झंडारोहण, अप्रतिम और दुर्लभ छवि देखकर किसी भी भारतीय को गर्व करने का अधिकार है. हृदय भाव-विभोर हो जाता है ऐसा दृश्य देखकर. ऐसा पल तो बार-बार नहीं आता. किसी भी राज्य के लिए उसके नागरिक की खुशियाँ उनकी सुरक्षा, समृद्धि और स्वतंत्रता में है.

चाह नहीं फूलों में गूथा जाऊं मैं….

चाह नहीं..

हमारे लिए जिन्होंने क़ुर्बानी दी, त्याग किया और जो शहीद होकर अपनी आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य दे गए उन्हें कोटिशः नमन. उनकी तपस्या और त्याग की वजह से हम आज नए भारत को देख पा रहे हैं. ऐसे जश्न के सहभागी बन पा रहे हैं. उनका अभिमान हम करें न करें वे आज अपनी संतानों को 75वें जश्न के साथ खुश देखकर ज़रूर सम्मान से अभीभूत होंगे. हमारी गंगा-जमनी तहजीब, तरह तरह के परिधान और लोक में फैली अनेकों संस्कृतियों की खुशबू हमारे उस असीम यात्रा की ओर निकल चुकी है अब जिस यात्रा पर हम मीलों चलकर देश की फिज़ा बदल सकते हैं.

हम अपने अनुशासन, सम्मान और सभ्यता के ध्वजवाहक हैं. हमारे देश का तिरंगा इसका प्रतीक है. हमारी एकता अखंड रहे. सौभाग्यपूर्ण हो. सुंदर हो और सांस्कृतिक रूप से हमारे सरोकार सभ्यता को समृद्धि प्रदान करें, किन्तु यह तभी संभव है जब देश में सब के मन में सबके प्रति अनुराग होगा. हम अपने अनुराग की निरंतरता को कायम करें और वह सनातन धर्म की सनातनता जैसे हम देखते हैं उसी तरह की अनुराग की निरंतरता बने, इसके आग्रही हों, यह आवश्यक है. हमारे सबके मनोभाव मनुष्य केन्द्रित और समाज केन्द्रित हों. सभी साथ साथ चलें. सभी सबके सुख-दुःख में एक दूसरे के मनोभावों को पढ़ें और एक दूसरे के काम आयें, ऐसा भारत हमारे संकल्प में हो, तो निश्चय ही अमृत पर्व का यह ‘अमृत स्वाधीनता पर्व’ ऐतिहासिक होगा. इसके लिए हमारे जीवन की शुचिता आवश्यक है. यदि हम इसके लिए दृढ़ होकर देश को शताब्दी वर्ष की ओर ले जाने की सोच लें तो भारत की छवि दुनिया में कैसी होगी, आप खुद सोचें.

कोई भी राष्ट्र तब तक महान नहीं बनता जब तक वहां के लोगों के मनोभाव प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा और सम्मान को धारण नहीं करते. हमारे देश भारत की सनातन सभ्यता इसका उदहारण है कि हमारे पूर्वजों ने सदैव ऐसे मूल्यों को जीवन का आभूषण बनाया. कोई भी देश ऐसी अवस्था में भी महान नहीं बन सकता जब उस देश में गरीबी, दरिद्रता और भय का माहौल हो. भूख से लोग दम तोड़ते हों और महिलाओं का सम्मान नहीं होता हो, बीमार लोगों की संख्या ज्यादा हो. हमारे देश में इन सभी को और अधिक ठीक तरीके से देखने-समझने की आवश्यकता है. हमें व्यापक सुधार की आवश्यकता है. हमें एक सशक्त भारत को और अधिक समृद्ध और सशक्त बनाने की आवश्यकता है. हमारे देश को जलवायु परिवर्तन, पृथ्वी संकट, हिंसात्मक घटनाओं और अप्रत्याशित चुनौतियों से भी लड़ना है. साथ ही विश्व में अपने उन उपलब्धियों के साथ देश खड़ा करना है जिससे पूरी दुनिया भारत की छवि को सम्मानभाव से देखे और भारत पर विश्वास करे, भारत को अगुआ बनाये. हमें सामरिक महत्व की चीजों को सुरक्षित करना है और भारत की सीमा में शांतिपूर्वक विस्तार भी करना है. यह देश अपनी निरंतरता और समृद्धता के मार्ग पर गतिशील होकर अपने सभी लक्ष्यों को हासिल कर सकता है किन्तु इसके लिए हमारी इच्छाशक्ति हमारे समस्त लक्ष्य-प्राप्ति में संबल बनेगी, इसका भी ध्यान रखना है.

 

लक्ष्य छोटे हों या बड़े हमारी तैयारी पुख्ता होनी चाहिए. एक छोटी सी चूक और एक छोटा सा स्वयं पर अविश्वास हमारे प्रयत्नों पर पानी फेर सकता है. इसलिए हम अपने मन पर विजय प्राप्त कर भारत को सही दिशा में ले जाने की यदि कोशिश करेंगे तो भारत सभी लक्ष्य प्राप्त कर लेगा, इसमें कोई दो मत नहीं है. एक बात यह इस स्वाधीनता वर्ष पर हमें पुनः विचारनी है कि हम भारत को कैसा देखना चाहते हैं?

जैसा विचार करेंगे,

जैसा यत्न करेंगे

वैसा भारत बनेगा.

मन के हारे हार

मन के जीते जीत.

एक सुखी, समृद्ध, भव्य और शानदार भारत के लिए हमारी कार्ययोजनाएं उसी अनुपात में सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है. नियोजन को समृद्ध करना है. हम लाभ के लिए नहीं जिएं, देश के लिए जिएं, दूसरों के लिए जिएं, स्वस्थ जिएं. देश में यदि भ्रष्टाचार, किसी तरीके का दुराग्रह और किसी भी तरीके के अवसाद रहेंगे तो देश की समृद्धता पर ग्रहण लगना स्वाभाविक है. इसलिए हमारे देश में शुचिता के प्रश्न आज हमारे समक्ष चुनौती की तरह हैं. आज़ादी के 75वें वर्ष में जब देश एक सशक्त नेतृत्व से अलग तरीके का गौरवबोध कर रहा है, हमारी सरकार का विजन-प्लान देश को नई दिशा में ले जाने के लिए तत्पर है, तो पूरे भारत के हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह जहाँ भी है, जिस दशा में है अपने हिस्से का खूबसूरत भारत निर्मित करे.

 सब कुछ सहेजना है सबको समानभाव से विकास के लिए अवसर मिला है तो सबका सम्मान रखना है-गरीब, मजदूर, किसान, नवजवान, महिला, बुजुर्ग, बच्चे, निःशक्त (दिव्यांग) सबके ख़ुशी के लिए हमारे प्रयास होने चाहिए. उन जनजातीय समुदाय को भी सर्वोत्तम ख़ुशी प्राप्त हो इसके लिए यत्न करना आवश्यक है. न किसी का अतिक्रमण हो न कोई अतिक्रमित हो, इसका ख्याल रखना है. एशिया में अनेकों देशों के इतिहास ऐसे हैं जहाँ लोकतंत्र बार-बार कुचला जाता रहा है. हमारे देश का मजबूत लोकतंत्र अपने 75वें पड़ाव पर है, इसीलिए हमारी ख़ुशी कई गुना ज्यादा है. हमारे देश में स्वच्छ भारत, एक भारत-श्रेष्ठ भारत और समृद्ध भारत की भव्यता इस बात में है कि हमारे लोकतांत्रिक प्रणाली में सबके लिए शिक्षा हो, सबके स्वास्थ्य महत्त्वपूर्ण माने जाएँ और सबको भर पेट भोजन और सर पर छत हो. इसके साथ ही हमारे सांस्कृतिक उल्लास कभी कम न हों. हम महामारियों का भी सामना करने में सक्षम हों. हमारे भीतर विराट हृदय हो और हम सबके प्रति उदार हों. आज़ादी के इस अमृत पर्व पर हमने जो खोया और जो पाया उसके बारे में आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है.

यदि सब कुछ अच्छा है तो शोर और अशांति क्यों है इसका आत्मावलोकन. यदि सब कुछ सुंदर है तो पीड़ा व हिंसा क्यों है, इसका आत्मावलोकन. और आत्मावलोकन इस बात का करना है कि हमारे भारत की वे कौन सी चुनौतियाँ हैं जो हमारे मार्ग में कहीं न कहीं बाधा बन जाती हैं. सच्चा देश हमारे आत्मावलोकन और सुधार पर निर्भर है. यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि जब हम भारत के आज़ादी का शताब्दी वर्ष मना रहे होंगे और उस सुबह को अनुभूतियों में मिश्रित कर रहे होंगे तो हमारी उस समय की पीढ़ी हमारे कार्यों और संकल्पों पर गर्व कर करेगी. इस बात का गर्व कि हमारे पूर्वजों ने सोचा कि हम रहें न रहें पर देश रहना चाहिए. इस बात का गर्व कि हमारे पूर्ववर्तियों ने हमारे देश की आन-बान-शान को हमेशा समृद्ध करके एक बेहतरीन भारत हमें प्रदान किया है.

यह 15 अगस्त 2022 है और हम इस महान क्षण के साक्षी हैं किन्तु हमारी आज से आगामी यात्रा शताब्दी वर्ष की वर्षगांठ को श्रेयष्कर बनाने के लिए शुरू हो रही है तो क्यों न हम शुभ करें, शुभ सोचें और सकारात्मक भाव से अपने भारत की तस्वीर बदलने के लिए निश्छल भाव से आगे बढ़ें. क्या आपको पता है कि आज से 25 वर्ष बाद शताब्दी वर्ष पर एक नए सौन्दर्यबोध के साथ भावी पीढ़ी हमारी प्रतीक्षा में है? यह मानकर चलिए कि हमारी सोच ही हमारा भारत है.

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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी-ओएसडी रह चुके हैं और अहिंसक सभ्यता के पैरोकार हैं. डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर/निदेशक हैं और डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या, उत्तर प्रदेश में एडजंक्ट प्रोफेसर हैं।

 

पता: डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470 003 (मध्य प्रदेश) मो. +91-9818759757 ई-मेल: [email protected]

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