रचनाकार

कहानी : सोसाइटी की बहन

@शब्द मसीहा केदारनाथ…

हमारी सोसायटी के प्रधान जी ने अचानक से मीटिंग कॉल कर ली थी। मैंने जब उनका व्हाट्सएप के ऊपर संदेश देखा तो मैं अपने फ्लैट से उतर कर नीचे चला आया। कई लोग खड़े हुए आपस में बातें कर रहे थे।

“यार! यह मेहतानी साहब ने क्या किया, अपना मकान अगर बेचना ही था तो किसी हिंदू को भी तो बेच सकते थे।” गजेंद्र शर्मा जी ने कहा।

“क्या हो गया? यह मीटिंग अचानक से क्यों बुलाई गई है?” मैंने पूछा।

“अरे भाई साहब! आप तो नौकरी पर चले जाते हो, आपको कुछ पता ही नहीं है। फ्लेट नंबर 94 किसी मुसलमान को बेच दिया है मेहतानी जी ने। ” कपूर साहब बोले थे।

“तो इसमें आपत्ति की बात क्या है? मेहतानी साहब का मकान था, जिसने उनको सही पैसे दिए उन्होंने बेच दिया। मुझे तो नहीं लगता कि हमें कोई आपत्ति होनी चाहिए। कोई कानून ऐसा तो नहीं कहता कि कोई मुसलमान यहाँ मकान नहीं खरीद सकता।” मैंने कहा।

“हद हो गई भाई साहब, आप तो लेखक हैं, दुनिया के बारे में बहुत अच्छी तरह से जानते भी हैं। इन मुसलमानों का कोई भरोसा थोड़े ही होता है। अब पता नहीं सोसाइटी में क्या क्या होने लगेगा।” मिश्रा जी ने मेरी बात को काटते हुए कहा।

“मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं लगता। मेरा अपना मानना है कि जब तक उनसे मिल कर के बात न कर ली जाय, उनके बारे में कोई भी राय बनाना ठीक नहीं है। और दूसरी सबसे अहम बात यह है कि मुसलमान क्या इस देश के नागरिक नहीं होते? क्या सारे मुसलमान आतंकी ही होते हैं? मैं आपको सैकड़ों हिंदू लोगों के नाम गिना सकता हूँ जिन्होंने आतंकियों से भी ज्यादा इस देश को धोखा दिया है। सेना कि सूचनाएँ लीक की हैं, देश का पैसा लेकर विदेश भाग गए हैं।” मैंने कहा।

“भाई साहब! आपका क्या है, आपके तो दो लड़के हैं। हमारी तो बेटियां भी हैं। लव जिहाद के बारे में तो आपको मालूम ही होगा। अब यह हमारे यहाँ भी होने लगेगा।” उपाध्याय जी ने तैश में आते हुए कहा।

“तो हम इस बात को लेकर परेशान हैं कि कोई मुसलमान हमारी सोसाइटी में आ गया है, उसकी वजह से लव जिहाद का खतरा है…. कमाल की सोच है। क्या आप लोगों को अपनी बेटियों के ऊपर भरोसा नहीं है? और दूसरी बात यह भी है कि क्या मुसलमानों को आप लोग इंसान नहीं समझते हैं? कितने ऐसा हिन्दू-मुसलमान का ज़हर फैलाने वाले अपनी बेटियाँ, बहिने मुसलमानों के साथ व्याहकर मस्त हैं। कई अभिनेता हैं कि उन्होंने कई-कई हिन्दू लड़कियों से शादी की, उनपर कोई सवाल क्यों नहीं। ” मैंने कहा।

“भाई मुसलमान हैं तो अपने लोगों के बीच में रहें, यहाँ पर तो सभी लोग हिंदू हैं। यह आदमी यहाँ पर माहौल खराब करेगा, इस बात की पक्की गारंटी है।” तनेजा साहब बोले।

“ठीक है, आपस में बहस से कुछ हासिल नहीं होगा। प्रधान जी को आने देते हैं। उनकी भी सुन लेते हैं।” मैंने कहा।

धीरे-धीरे कर सोसाइटी के काफी लोग जमा हो गए थे। सोसायटी के प्रधान गौतम प्रसाद जी अभी तक नहीं पहुंचे थे। कुछ देर माहौल में आपस में बहस और गर्मा- गर्मी होती रही। करीब दस मिनट बाद प्रधान जी भी आते हुए दिखाई दिए। प्रधान जी ने माइक ऑन किया और बोलना शुरू किया।

“मुझे सोसाइटी के कई लोगों के मैसेज आए कि हमारी सोसाइटी में किसी मुसलमान ने मेहतानी साहब का मकान खरीदा है। अभी एक हफ्ते पहले ही उन्होंने शिफ्ट किया है। कई लोगों को उनके यहाँ होने पर ऐतराज है।”

“लेकिन मेरा एक सवाल है आपसे। क्या उनका मुसलमान होना इस सोसाइटी के लिए कोई खतरा है? क्या जब सरकार ने हमें ये मकान बेचे थे उस समय उसमें कोई शर्त रखी थी कि इस सोसाइटी के अंदर कोई मुसलमान मकान नहीं ले सकता?” मैंने कहा।

“भाई साहब! ऐसी तो कोई शर्त नहीं है। लेकिन माहौल को देखते हुए यह बात चिंता की बात तो है। यह लोग जहाँ भी रहते हैं कुछ न कुछ बवाल जरूर पैदा होता है।” प्रधान जी बोले।

“माफ कीजिएगा सर, किसी को जाने बिना, किसी के बारे में कोई भी राय बना लेना अच्छी बात नहीं है। मेरा आपको एक सुझाव है कि सबसे पहले हम लोगों को चाहिए कि हम उनके बारे में मालूमात करें, और उसके लिए जरूरी है कि या तो हम सभी लोग उनके यहाँ चलें या फिर उन्हें यहाँ बुला लिया जाय।” मैंने कहा।

“आपके और मेरे बुलाने से वह यहाँ नहीं आएंगे। उन्हें पता है कि वह लोग क्या करते हैं।” प्रधान जी बोले।

“आप ऐसा कैसे सोच सकते हैं? बिना जानकारी के किसी के ऊपर में आरोप लगा देना अपराध है। इस तरह से किसी भी सोसाइटी के अंदर हिंदू-मुसलमान की बात करना भी अपराध है। आप लोग शायद नहीं जानते हैं कि इस देश के लिए जिस तरह से हिंदुओं ने अपनी जान दी है, उसी तरह से मुसलमानों ने भी अपनी जान दी है। और जहाँ तक किसी के खराब होने की बात है तो कोई भी हिंदू या मुसलमान खराब हो सकता है। कोई भी व्यक्ति लालच में आ सकता है। सेना जैसी सम्मानित संस्थाओं के अंदर भी बहुत सारे हिंदू लोगों ने देश के साथ गद्दारी की है। लेकिन उनके प्रति आपका रवैया कभी गुस्से वाला देखने को नहीं मिला। जिस व्यक्ति के बारे में हम कुछ भी नहीं जानते, उसके लिए हम यहाँ मीटिंग कर रहे हैं। आपको हर तरह से विचार करना चाहिए। इस बात का जब उन्हें पता लगेगा तो वे हम सब के बारे में क्या सोचेंगे ?” मैंने कहा।

“देखिए आपकी बात ठीक है लेकिन….. बाकी लोगों की बातों को भी तो मुझे सुनना होता है।” प्रधान जी बोले।

“गौतम जी! आप मेरे साथ सोसाइटी के सभी कार्यकर्ताओं के साथ चलिए। हम पांच-छह लोग उनके घर चलते हैं। उनका परिचय लेते हैं, उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करते हैं फिर किसी फैसले पर पहुंचेंगे। आपकी क्या राय है।” मैंने कहा।

“मुझे भी लगता है कि आपका सुझाव सही है। हम पहले उनसे बात कर लेते हैं, उनका बैकग्राउंड जान लेते हैं, और हम लोगों की जो चिंता है उससे भी उनको वाकिफ करा देते हैं। सोसाइटी के बाकी लोग यहाँ रहें और आप चाहे तो आप भी हमारे साथ चल सकते हैं ।” प्रधान जी ने मुझसे कहा।

लोगों के बीच में कुछ देर खुसर पुसर होती रही और कुछ देर बाद प्रधान जी, कोषाध्यक्ष, सेक्रेटरी सहित हम पाँच लोग उनके घर पहुंचे। दरवाजा खटखटाया तो एक बुजुर्ग ने दरवाजा खोला।

“अस्सलाम वालेकुम।” मैंने कहा।

“वालेकुम अस्सलाम आइए।” उन्होंने हम सभी को बड़ी तहजीब से घर में आने के लिए कहा।

“बेटी रेहाना! जरा शरबत लेकर आओ, सोसाइटी के पड़ोसी मेहमान आए हैं।”

“भाई साहब! आप यह सब रहने दीजिए। यह सोसाइटी के प्रधान जी हैं, यह सेक्रेटरी साहब हैं, यह कोषाध्यक्ष हैं, और मैं आपका पड़ोसी हूँ।” मैंने कहा।

“बहुत अच्छा लगा कि आप लोग हमसे मिलने आए हैं। बेटे की मौत के बाद बहुत दिल उखड़ा-उखड़ा रहता था। यहाँ पर राशिद भाई वेल्डिंग वाले हैं, उन्होंने बताया कि यह सोसाइटी बहुत अच्छी है, यहाँ पर हरियाली है। मेरी बेगम को साँस लेने में तकलीफ होती है, इसलिए हम लोगों ने अपना मकान बेचकर यहाँ पर अपना आशियाना बनाया है। रेहाना मेरी बहू है। बेटा इंडियन आर्मी में था। सांबा बॉर्डर पर पाकिस्तानियों से लड़ते हुए शहीद हो गया। पहले रेहाना भी एयर फोर्स में थी। फिर हम लोगों की देखभाल के लिए बच्ची ने नौकरी छोड़ दी। एक और बेटा है वह डी आर डी ओ में काम करता है। बेटी की शादी कर दी और उसके हस्बैंड दुबई में इंडियन एंबेसी में काम करते हैं। अपने बच्चों को इस मुल्क की खातिर पाल पोस कर बड़ा किया। हमारे अब्बू मियां और दादा जान इसी मुल्क की मिट्टी में सो रहे हैं। पहले हम लोग सैनिक विहार में रहते थे…. बस हमारी बहू को वहाँ रहना पसंद नहीं था, अपने घरवाले की यादों में खो जाती थी, इसलिए हम लोगों ने आप लोगों के बीच में मकान लिया है।” वह बुजुर्ग बहुत ही मीठे अंदाज़ में बोले।

अब तो साथ आए सब लोगों के चेहरे जैसे लटक गए थे। प्रधान जी भी खामोश बैठे हुए थे और कोषाध्यक्ष जी कमरे में लगी हुई तस्वीरों की तरफ देख रहे थे।

“आपके बेटे का नाम क्या था?” प्रधान जी ने पूछा।

“मेजर आफताब अहमद। पता नहीं उसे इतनी जल्दी क्या पड़ी थी। और इस रेहाना को भी भूत सवार है अपने बेटे को फौजी बनाना चाहती है। अपनी ममता से दूर कर रखा है। आर्मी स्कूल में पढ़ता है… बड़ा होकर उसे भी अपने बाप की तरह एक मुल्क पर कुर्बान होना है। हम लोगों का परिचय तो हमारा जुनून है। आप बताइए कैसेआना हुआ आपका। ” बुजुर्ग बोलें।

“बस आप लोगों की खैरियत और आप लोगों के बारे में सोसाइटी के लोग जानना चाहते थे, इसलिए हम लोग यहाँ आ गए।” मैंने बात को संभालते हुए कहा।

“बहुत अच्छा किया… हम लोग इसी बात को लेकर परेशान थे कि पता नहीं हमारे पड़ोसी हमें पसंद करते भी हैं या नहीं।” बुजुर्ग ने कहा।

“अरे ऐसा कैसे हो सकता है, आप हमारी सोसाइटी के नए सदस्य हैं, तो आपका स्वागत करना हम सब का फर्ज़ बनता है।” इस बार प्रधान जी बोले थे।

“प्रधान जी! आप बता रहे थे कि 15 अगस्त पर नेताजी टाइम नहीं दे पा रहे हैं। अब उनके यहाँ आने की जरूरत ही नहीं है। हमें असली हीरो मिल गया है।” मैंने कहा।

“क्या मतलब भाई साहब?” प्रधान जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा।

“मतलब यही कि जिसने देश के लिए जान दी हो, जो देश के साथ-साथ अपने परिवार की भी देखभाल कर रही हो और जिसमें अपने बेटे को कुर्बान करने का जज्बा हो, उससे ज्यादा अच्छा कौन चीफ गेस्ट हो सकता है। रेहाना जी से गुजारिश कर लेते हैं कि वह 15 अगस्त के प्रोग्राम में हम सब लोगों के बीच आयें, और हम सब लोग मिलकर उनका सम्मान करें।” मैंने कहा।

“अरे वाह…. ऐसा तो हमने सोचा ही नहीं था। इससे अच्छा और क्या हो सकता है, शहीदों की अगर हम लोग कद्र नहीं करेंगे तो कौन करेगा। सर जी! हम सभी लोग 15 अगस्त के प्रोग्राम में आप को आमंत्रित करते हैं।” प्रधान जी बोले।

“हाँ, हमें आप सभी लोगों से मिलकर खुशी होगी, लेकिन मैं एक बात कहना चाहता हूँ।” बुजुर्ग बोलें।

“जी, कहिए आप क्या कहना चाहते हैं।” सेक्रेटरी साहब ने पूछा।

“मैं अपनी बेटी के साथ राष्ट्रीय गान गाना चाहता हूँ, हम लोगों को वंदे मातरम भी याद है, वह जो बजाया जाता है मुझे पसंद नहीं आता। मैं चाहता हूँ कि हम सब लोग मिलकर वंदे मातरम गायें। आपको कोई एतराज तो नहीं है?” बुजुर्ग ने कहा।

हम सब लोग मौन और अपनी सोच पर हताश और शर्मिंदा थे। कुछ देर बाद रेहाना सभी के लिए शरबत ले आई थी।

“आप हमारे घर पहली बार आए हैं, बिना शरबत पिलाये हम आपको कैसे जाने दे सकते हैं। आप हमारे घर मेहमान हैं।” रेहाना ने मुस्कुराते हुए कहा।

लंबी, ऊंची बहुत ही सधी हुई जुबान, चौड़ा माथा गोरा रंग एकदम ऐसे जैसे कोई पच्चीस साल की जवान लड़की हो। नीचे जींस, बानियान और सिर दुपट्टे से ढंका हुआ ।

“रेहाना जी! हमें आपकी मदद चाहिए। हम चाहते हैं कि सोसाइटी के बच्चों को आर्म्ड फोर्सेस में जाने के लिए आपकी गाइडेंस मिले। इस देश का सभी पर कर्ज है। आपने तो अपना कर्ज उतार दिया, अब हमारी बारी है।” मैंने कहा।

“मुझे खुशी होगी। आप बता दीजिएगा कि मुझे कब आना है, लेकिन फोर्स के अंदर हर कोई नहीं जा सकता, बहुत मेहनत और मुल्क के लिए पक्का जज्बा दिल में चाहिए। कई साल की मेहनत और ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। ये चुनाव लड़ने जैसा आसान काम नहीं है । अगर बच्चों को ट्रेनिंग भी देनी है तो मैं उसके लिए भी तैयार हूँ, पर उससे ज्यादा पेशेंस पेरेंट्स को होनी चाहिए, ताकि उनका मॉरल सपोर्ट बना रहे।” रेहाना ने कहा।

“उसके लिए सोसाइटी को आपको कुछ देना होगा? आप अपनी सेवा की फीस बता सकती हैं। आखिर आप भी तो अपना समय देंगी।” सेक्रेटरी साहब ने कहा।

“बहुत बड़ी फीस लेती हूँ मैं। नफ़रत के माहौल में, आप लोग हमारे घर आए, हमारे बारे में पूछा, हमें अपना समझा उसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। यह सोसाइटी हमारा घर है, आप सब हमारे हैं, अगर आपने हमें अपना समझा है…. तो इस नाते से यहाँ के सब बच्चे हमारे हुए…. फीस लेने का तो सवाल ही नहीं उठता। पैसा आदमी को पराया कर देता है, और मुल्क पर कुर्बान होने के जज्बे की कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती।” रेहाना हम लोगों के वहाँ एकसाथ जाने का शायद कारण जान चुकी थी।

“वाह रेहाना बहन, आपने तो हमारा दिल जीत लिया। बस इसके बदले में इतना ही कहूँगा के इस बार ये भाई आपके पास राखी बंधवाने आएगा। कहिए आप मुझे राखी बांधेगी ?” मैंने कहा।

“अरे ऐसा कैसे हो सकता है, आप अकेले-अकेले इनसे राखी बंधवा लेंगे। भाई यह तो आपकी ज्यादती है हम सबसे। हम सब भी आएंगे रक्षाबंधन वाले दिन। लेकिन आपका ये कमरा छोटा पड़ेगा …. हम ऐसा करते हैं कि सोसाइटी के हॉल में रक्षा बंधन मनाते हैं …. क्यों भाई लोगो।” प्रधान जी मुस्कुराते हुए बोले।

“हाँ, यह बढ़िया रहेगा। रेहाना जी सिर्फ हमारी ही नहीं बल्कि पूरी सोसाइटी की बहन है।” सेक्रेटरी साहब बोले और सभी ने शरबत के गिलासों पर धावा बोल दिया।

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