“अरे! कितने कामचोर हो यार, तुमसे कहा था कि ये रेत सब छत पे पहुँच जाना चाहिए . अभी तक आधा ही ऊपर गया है .” घर लौटे मालिक ने मजदूर से उलाहना देते हुए कहा . “साहब ! सब हो जाएगा . वो हम तनिक ………” वह कुछ कहना ही चाहता था कि मालिक ने फिर टोका . “मालूम है , तनिक बीडी पी रहे थे या कहोगे कि खैनी खा रहे थे . भाई मैं पैसा देता हूँ तो मुझे काम भी चाहिए पूरा . चाहे देर हो जाय पर शाम को पैसे तभी दूंगा जब ये रेत तुम ऊपर पहुँचा दोगे.” और वह अन्दर चला गया . मजदूर ने फिर से कट्टे में रेत भरना शुरू कर दिया . “आ गए बेटा ! ” बूढी माँ ने पूछा . “हाँ, आ गया माँ . ये मधु कहाँ चली गई थी . बाहर उस मजदूर ने कुछ काम किया ही नहीं . पैसे क्या पेड़ों पर लगते हैं . ये मजदूर तो होते ही हड्डी हराम हैं . मधु को नजर रखने को कहकर गया था , अभी तक काम अधूरा पड़ा है . पडोसी और झगडा करेंगे अगर ये रेत ऊपर नहीं पहुंची तो.” वह तुनतुनाया हुआ था. “बेटा! गलती न तो मजदूर की है और न मधु की. गलती मेरी है . मैंने ही उसे जरा कह दिया था कि मेरे पैरों में बहुत दर्द है. अगर मेरा बेटा या बेटी होती तो मुझे तेल लगा देते. उस मजदूर ने कम से कम एक घंटा मेरे पैरों की मालिश की. कामचोर नहीं है , बहुत ईमानदार है . उसने पैसे लेने से भी मना कर दिया . उसे शाम को पचास रुपये ज्यादा दे देना ….राम उसका भला करे .”