काश मेरे भी पापा होते
(शब्द मसीहा केेेेदारनाथ)
“अबे! ओ अक्ल के अंधे, काहे को घूम रिया है बाहर?”
“क्यों ? मुझे क्या कोरोना हुआ है ?”
“अबे! तो क्या इंतजार कर है कि तुझे कोरोना हो ?”
“तुम्हारा दिमाग खराब हुआ है बुड्ढे । मुँह पर मास्क लगा रखा है , जुबान पे भी लगा ले। मेरी मर्जी है , जो मेरा दिल करेगा करूंगा।”
“अबे! देश के लिए मरना नहीं है, घर में रहना है। प्रधान मंत्री ने हाथ जोड़े हैं …तुम्हें कृष्ण भगवान तक कहा है । कोरोना के खिलाफ ये महाभारत ही है । दूर रहना , घर में रहना ही हमारी ढाल है। हाँ, मैं बूढ़ा हूँ, मगर मुझे अपनी ज़िंदगी से प्यार है। तू अभी जवान है, तुझे कुछ हो गया तो तेरे माँ-बाप की सोच, वो बिना कोरोना ही मर जाएँगे…. किसी को मत सुन …खुद को तो बचा।”
“अरे! अंकल , ये बूढ़ों को ही ज्यादा होता है। आप सम्हल के रहो।”
“कल ही 43 साल का जवान मरा है, वो क्या जवान नहीं था? टी वी देखता है न ।”
“घर से ही काम करता हूँ , समय नहीं होता फालतू की चीज देखने का मेरे पास । ”
“तो समझ ले कि इक्कीस दिन का प्लास्टर चढ़ा है । इक्कीस दिन बाद पता चलेगा कि टांग ठीक हुई है या नहीं । घर में आलसी बन के पड़ा रह …. सरकार कोई सीमा पे मरने को नहीं कह रही है ।”
“मैं आपका क्या लगता हूँ ? इतना क्यों समझा रहे हो मुझे?”
“अबे! तू भी मेरे बेटे जैसा है और बाप को बेटों की गालियां खा के भी उनके सुधरने की आस रहती है।”
“बस करो अंकल …सॉरी …. अंदर जा रहा हूँ ….. काश मेरे भी पापा होते।”

