खास-मेहमान

शब्द मसीहा की कहानी : भगोड़ी लड़की

(शब्द मसीहा केदार नाथ)

श्रुति को रात दस बजे अपने बड़े से सूटकेस के साथ देखकर घर के सभी लोग हैरान रह गए थे । माँ ने सूटकेस पकड़ा ही था कि दादा जी ने साफ मना कर दिया था ।

“बहू ! रुको, ये घर में नहीं आएगी । भागकर आई है ।”

सब लोग हैरान और परेशान । मगर दादा जी आगे कोई बोल नहीं सकता था ।

“मगर पिता जी , रात के दस बज रहे हैं अब । कहाँ जाएगी ये ?” श्रुति के पिता ने अपनी लाड़ली का पक्ष लिया था ।

“वहीं, जहां से आई है । इसे क्या तकलीफ थी जो ये इस तरह वापिस आ गई , कम से कम हमें बताना चाहिए था । अकेली रहती है दामाद के साथ ….अब कौन-सी परेशानी थी इसे ?”

“दादा जी ! मैं वापिस नहीं जाऊँगी । मुझे उसके यहाँ नहीं रहना है। उसको लड़कियों के फोन आते हैं । वो कुछ छिपा रहा है मुझसे । उसका मुझे भरोसा नहीं रहा ।” श्रुति ने दरवाजे पर खड़े-खड़े ही बोला ।

“कोई सबूत है तुम्हारे पास ?” दादा जी ने पूछा ।

“हाँ , कई बार जब किसी और से बात कर रहे होते हैं तो मेरे फोन पर भी लड़कियों के फोन आते हैं ।” श्रुति बोली ।

“कभी तुमने उसकी बात सुनी है ? या तुमने कभी उसका फोन उठाया है ?” दादा जी ने पूछा ।

“नहीं , लेकिन उसे लड़कियों के फोन आते ही क्यों हैं ? मुझसे सीधे मुंह बात भी नहीं करता । घर को भी ऑफिस बना रखा है।” श्रुति बोली ।

“ठीक है , किसी को फोन लगाओ और फोन को लाउडस्पीकर पर रखो ।” दादा जी कहने के बाद श्रुति ने एक नंबर डायल किया ।

“हैलो !”

“अरे! श्रुति तुम कहाँ हो ? राजेश भैया कितने परेशान हो रहे हैं । ठाणे में रिपोर्ट लिखवाने गए हैं । घर का सामान भी बिखरा हुआ है । क्या हुआ है तुम्हें ? हम लोग कब से अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं । तुम ठीक तो न बहिन ।” सामने से रेखा ने कई सारे सवाल दाग दिये ।

“हाँ, मैं ठीक हूँ ।”

“थेंक गॉड। तुरंत राजेश को फोन लगाओ । पागल हुआ पड़ा है वो ।” रेखा ने कहकर फोन काट दिया था।

अब श्रुति किसी मूर्ति की तरह चुपचाप खड़ी थी । पापा ने तुरंत राजेश को फोन लगाया ।

“हैलो ! राजेश बेटा , मैं श्रुति का पापा बोल रहा हूँ ।”

“पापा जी ! मैं बहुत परेशान हूँ । श्रुति नहीं मिल रही है । घर का सामान बिखरा हुआ है । पता नहीं क्या हुआ है उसे । अस्पताल-अस्पताल ढूंढ रहा हूँ , पुलिस में भी काम्प्लेन्त दे दी है । आपको फोन लगाने की हिम्मत नहीं हुई मेरी । पता नहीं कैसी होगी मेरी श्रुति ।” राजेश का स्वर आशंका और प्रेम में भर्राया हुआ था ।

“तुम जल्दी से घर आ जाओ । घबराओ मत । श्रुति यहाँ है।” पापा जी ने फोन काट दिया था । अब सब लोगों के चेहरे का तनाव कम हुआ था ।

“जाओ बहू , इसे अंदर ले जाओ । लेकिन इसका सूटकेस बाहर ही रहेगा । राजेश भी आता होगा ।” दादा जी बाहर ही बैठ गए थे । बाकी सभी लोग श्रुति के साथ अंदर चले गए थे ।

कुछ देर बाद राजेश की गाड़ी दरवाजे पर रुकी । राजेश बाहर आया और दरवाजे पर दादा जी को देखा तो उनके पैर छूए ।

“श्रुति कहाँ है? वो ठीक तो है ?” राजेश ने पूछा ।

“तुम्हारी पत्नी आई है । उसका सूटकेस अपनी गाड़ी में रखो । अभी भुलाता हूँ उसे ।” दादा जी बोले ।

“मेरी पत्नी आई है !!” अवाक सा राजेश दादा जी मुंह को देखने लगा ।

“हाँ, मेरी बेटी आई होती तो अपने पति के साथ आती । घर छोडकर आई है, इसलिए सूटकेस बाहर रखा है ।” दादा जी ने कहा । राजेश ने गाड़ी की डिक्की खोली और सूटकेस को अंदर रख के वापिस आया ।

“राजेश बेटा ! मैं माफी चाहता हूँ । श्रुति बहुत नादान है । अगर तुम आपस में बैठकर बात नहीं करोगे तो तुम्हारे बीच की खाई और बड़ी हो जाएगी । तुम दोनों के बीच कोई नहीं आ सकता बेटा । हम भी नहीं ।” दादा जी बोले ।

“जी , अब आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। क्या मैं श्रुति को ले जाऊँ?” राजेश बोला ।

“जाओ , अंदर जाओ । कुछ खा पी लो फिर ले जाना ।” दादा जी राजेश के साथ अंदर चले गए । सब लोग राजेश को देखकर चुप हो गए ।

“बैठिए , मैं खाना लगाती हूँ ।” श्रुति की माँ बोली ।

“नहीं मम्मी ! अभी मैं आपका दामाद नहीं हूँ । एक भगोड़ी लड़की का पति हूँ । ये नाम दादाजी ने ही दिया है। ” राजेश बोला।

“हा हा हा ….गुस्सा थूक दो बेटा । ये तो है ही नालायक । खूब सुनाया है उसे । तुम्हें तकलीफ हुई उसके लिए मैं माफी चाहती हूँ । पर बेटा आपस में कभी भी कोई बात मन में आए तो बोल देना चाहिए । अब अकेली रो रही है अपने कमरे में ।” श्रुति की माँ ने कहा ।

“आप भी अच्छी माँ नहीं हैं । मेरी बीबी रो रही है और मैं खाना खा लूँ ? आप खाना वहीं दे दीजिये । बहुत भूख लगी है , पता नहीं उसने कुछ खाया है या नहीं ।” राजेश बोला ।

“हम भगोड़ी लड़की को कुछ नहीं देते ।” माँ ने मुसकुराते हुए कहा । राजेश श्रुति के कमरे में चला गया । श्रुति औंधे मुंह पड़ी रो रही थी ।

“हैलो भगोड़ी लड़की । पुलिस इंतजार कर रही है घर चलो । तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसे भागने की ? कोई और पसंद है क्या ?” राजेश ने कटाक्ष किया ।

इसबार श्रुति उठी और सीधे राजेश के सीने से लग गई ।

“मुझे सबने डांटा है अब तुम भी ऐसे कहोगे ?” श्रुति ने कान में कहा ।

“जरा अपना चेहरा तो दिखाओ , रोते हुए बुरी बंदरिया लगती हो तुम ।” श्रुति ने राजेश आ चेहरा देखा और फिर उसके सीने से लिपट गई ।

माँ खाना ले आई थी । माँ के खाँसने से दोनों अलग हुए । राजेश ने श्रुति को बैड पर बैठाया और खाने का निबाला उसके मुंह में डाल दिया ।

“नहीं , पहले आप ।” और श्रुति ने भी निबाला राजेश के मुंह की तरफ बढ़ा दिया ।

दस मिनिट बाद दोनों कमरे से बाहर आ गए। सभी लोग बाहर ही बैठे हुए थे।

“अब मैं इजाजत चाहूँगा घर जाने की ।” राजेश बोला।

“इजाजत है । हम भगोड़ी लड़की को अपने यहाँ नहीं रखते । अगली बार अगर ऐसी हरकत हुई तो दरवाजा भी नहीं खुलेगा । बेटी -दामाद का स्वागत है मगर भगोड़ी लड़की के पति का नहीं …..हा हा हा ।” श्रुति के पिता ने श्रुति को चपत मारते हुए कहा ।

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