कुटुंब की सियासत और पिछड़ों की गोलबंदी अर्थात् 2027 की राजनैतिक बिसात
यूपी की सियासत और चाय ज़रा अलग किस्म की होती है। दोनों का लहज़ा खित्ते के हिसाब से बदल जाता है। पश्चिम में चाय मीठी बढ़िया मानी जाती और पूरब में कड़ी। सियासत में भी कहीं बाबू साहब लोगों का दबदबा है तो कहीं पंडित जी, जादौ जी, मियाँ भाई जी आदि का बोलबाला है। आज कल ‘कुटुंब’ चर्चा में है। माना जा रहा है क्षत्रिय बिरादरी खुल कर बाबा जी के पक्ष में खड़ी है। इन दिनों पिछले कई महीनों से यूपी के मुख्यमंत्री को बदलने की बातें लगातार सुनी-सुनायी जा रही हैं। महाराज जी हैं कि डटे हुए हैं। ये सही है कि पूर्व की समाजवादी सरकार के कामों के चलते भाजपा की सरकार यूपी में आयी। फ़िर इसने दुबारा भी सत्ता हासिल की। हालांकि ऐसी उम्मीद कईयों को थी नहीं। फ़िर भी योगी जी को जनता ने दुबारा चुना। इसी के साथ क्षत्रिय बिरादरी के लोगों को अरसे बाद एक अपना मुखिया मिला। वो भी ऐसा जिसकी सर्वमान्यता हर समाज में हो। ज़ब सत्ता में कोई व्यक्ति केंद्रबिंदु बन जाता है तब उसके तत्कालीन आभा मंडल के चलते अनायास ही लोग उसके इर्द – गिर्द जमा होने लगते है। जिसमें सबसे अहम भूमिका जाति की होती है। क्योंकि कि माना जाता है कि सियासत और अपराध में जाति का महत्वपूर्ण रोल होता है। ऐसे में वो राजनैतिक प्रमुख अपने जाति सहित समाज के रोल मॉडल के रूप में भी स्थापित होता है। ये अलग बात है कि वो कितना प्रभावी होता है? ये, समय तय करता है। राजनीति में ऐसे कई नाम है जिनके आज़ नहीं होने के बाद भी उन्हें याद करना ही पड़ता है।अभी भी भारतीय समाज का ढांचा इसके ही सांचे में रचा बसा है। लगभग हर जाति के क्षेत्र में नेता और बड़े अपराधी उसी जाति के होते है जिसका वहां प्रभुत्व होता है। इसलिए जाति की भूमिका किसी भी लिहाज़ से कमतर नहीं होती। ख़ास कर चुनाव में इसकी उपयोगिता और महत्वपूर्ण हो जाती है। आज़ की तारीख़ में कुल 49 विधायक क्षत्रिय है। जिसमें 43 भाजपा के और 4 सपा के 1 बसपा के और 1 जनसत्ता दल के हैं। यूपी की सियासी जमीन में जाति का कितना महत्व हैं बस इतना बताना ही काफ़ी हैं कि चाहे प्रगतिशील राजनीति का ढिंढोरा पीटते कई राजनैतिक दल भी चुनाव में बिना जातीय आधार के टिकट नहीं बांटते।यहाँ मौजूदा दौर में 41 प्रतिशत ओबीसी वोटर है। एससी / एसटी 21 प्रतिशत । ब्राह्मण 12, मुस्लिम 18प्रतिशत और क्षत्रिय 8 प्रतिशत के क़रीब हैं। अब भाजपा के मौजूदा विधायकों में 46 ब्राह्मण विधायक हैं और क्षत्रिय 43। यानि सवर्ण विधायक सबसे अधिक। सारी क़वायद जो जोड़ – तोड़ की हो रही है उसका केंद्र बिंदु भी यही हैं । उत्तर प्रदेश में तकरीबन 104 सीट पर सवर्ण मतदाता जीत – हार तय करते हैं और लगभग 178 सीट पर मुस्लिम – यादव। इन मौजूदा आंकड़ों पर गौर करें तब एक बात स्पष्ट हो जाती है कि बीजेपी ने भले 2017 के सापेक्ष 2022 में कमतर प्रदर्शन किया पर उसने विपक्षी दलों से बेहतर परिणाम हासिल किए।सारी कमियों, खामियों के बाद जनता ने योगी के नेतृत्व में भाजपा को वोट किया। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। भाजपा ने टिकट बंटवारे सहित जिलाध्यक्ष चुनने तक में जातिगत समीकरणों का भरपूर ख़्याल रखा। जिसका फ़ायदा भी उसे मिला।
सपा,जो कभी समाजवादी विचारधारा को लेकर गठित हुई थी उसने कहीं न कहीं उससे अलग रास्ता चुना। जिस संसाधनों पर राज्य का अधिकार होना चाहिए उसकी बात न कर उसने भी जातीय आधार को ही अपना चुनावी दांव बनाने के साथ – साथ राजनैतिक एजेंडा भी बनाया। जिसके चलते पार्टी में मुस्लिम -यादव के गठजोड़ के भरोसे उसने अन्य जातियों को हाशिये पर कर दिया। ज़बकि समाजवादी राजनीति के शुरुआती दौर में ऐसा नहीं था। उसके नेता जनता से सीधे जुड़ते थे। तक़रीबन हर समाज के नेता उसके साथ थे।आगे चलकर इसमें शामिल अगड़ी सहित कई पिछड़ी जातियों को लगने लगा कि जिस पिछड़े गठबंधन के नाम पर वो इसमें शामिल हुए उन्हें उतनी प्राथमिकता नहीं मिल रही जितनी मिलनी चाहिए। उन्होंने,सपा का दामन छोड़ भाजपा नीत एनडीए गठबंधन को चुन लिया। आज़,सपा के पास सिर्फ़ यादव विधायकों को छोड़ दें तब अन्य पिछड़ी जातियों के विधायक योगी सरकार में उससे ज़्यादा शामिल हैं। कुर्मी, सपा से दुगुने बीजेपी में जीते हैं । लोध पांच गुना की तादाद में जीते।मौर्य, शाक्य, कुशवाहा, सैनी 6 गुना संख्या में जीते। कहीं न कहीं सपा से अपने शुरुआती स्वरुप को बनाये रखने में चूक हो गई। याद कीजिये उस सपा को जिसमें जनेश्वर मिश्रा, मोहन सिंह जैसे सीधे – सरल खांटी समाजवादी थे। समाजवादी पार्टी की अब एक जाति विशेष भर की ही पार्टी बनने की पहचान जुड़ गई है।जो,उसके राजनैतिक भविष्य के लिए हितकर नहीं है। हालांकि अभी भी लोगों को अखिलेश यादव की साइकिल यात्रा याद है। उनका प्रगतिशील दृष्टिकोण अभी भी जनता को लुभाता हैं। यही मुख्य कारण थे जिसने सपा को 2012 में सत्ता दिलायी थी। उस समय याद कीजिये कौन सी जाति ने सपा को वोट नहीं किया था? किस जाति के विधायक उसके पास ठीक – ठाक नहीं थे? बसपा ने भी सिर्फ़ एक बार ब्राह्मण, दलित वोट बैंक के दम पर सरकार बनाई पर वो दुबारा ऐसा कर पाने में असफल रही। इनका जिक्र सिर्फ़ इसलिए है कि सत्ता साधने में अक्सर अच्छे – बुरे प्रयोग के परिणाम नज़र आते हैं। कभी वो सकारात्मक रूप में बहुमत के साथ प्राप्त होते है और कभी बुरी तरह हार की शक्ल में। अभी,ज़ब कुटुंब और पीडीए के जरिये जातियों की गोलबंदी चालू है ऐसे में बड़ी ख़ामोशी से बसपा, पिछड़ों को अब अपनी जिला कार्यकारिणी में भी महत्वपूर्ण पद देने की बात कर रही है।उसे भी लगने लगा है कि उसका अस्तित्व खतरे में है। बसपा के एक मात्र विधायक हैं वो भी क्षत्रिय। उसका, परम्परागत वोट बैंक अभी जो ठीक – ठाक स्थिति में उसके पास है यदि ऐसे में पिछड़े वर्ग का पहले वाला भरोसा बसपा को हासिल हो जाय तब मुस्लिम वोट बैंक को वो आसानी से अपने पाले में कर अगली सरकार बना सकती है। ऐसे में यूपी के भीतर चुनावी सरगर्मी अभी से दिखनी लगी है, ज़बकि चुनाव में अभी 2 साल बाक़ी है।
2027 के विधानसभा चुनाव में देखना ये है कि पिछड़े और दलित की राजनीति अगली सरकार बनाती है या सिर्फ़ कुछ विशेष जातियों का गठबंधन ही लखनऊ की सत्ता संभालेगा। इन सारी बातों के साथ एक तथ्य स्पष्ट है कि वोटर उसे ही बहुमत देते है जिससे उसको सुरक्षा,शिक्षा, सड़क, स्कूल,अस्पताल बेहतर मिलने की अपेक्षा होती हैं। यहीं हर पार्टी जीतती हारती है। चाहे या अनचाहे रूप में हर दल को इसकी बात करनी पड़ती है। इसी के इर्द – गिर्द आज़ भी वोटर केंद्रित हैं। प्रतीत भले ऐसा हो कि जनता जातिगत समीकरण के आधार पर वोट करती है पर ये पूर्ण सत्य नहीं है। अगले उप्र विधानसभा चुनाव में जनता किन पर ज़्यादा भरोसा करेगी ये देखना भी महत्वपूर्ण होगा। उसने जातीय गोलबंदी की सरकार भी देखी है और सबका साथ सबका विकास वाली सरकार भी। फ़िलहाल ‘कुटुंब ‘जहां अपने कुल मुखिया से परिवार प्रमुख की पदवी बरकरार रखवाने की दबाव वाली कारगर कोशिश करता दिख रहा है तो वहीं एक गुट इसे बदलवाने के प्रयास में लगा है। देखना ये है कि ‘कुल मुखिया’ कौन सा निर्णय लेते हैं? दबाव वाला, यथा स्थिति वाला या फ़िर कोई नया – सबका साथ, सबका विश्वास के तहत जनहित वाला।

