कविता ! एक बेटी के शब्द अपने पापा के लिए…

@ रमा भारती….
जान हूँ मैं आपकी पापा
आपने मुझसे हमेशा कहा
नन्ही सी कली को सहेजकर
फूल बनाया आपने पापा
बेटा बेटा कहते थकते नहीं
आज कैसे बिदा कर दिया
आपने पापा!!!
घर में पाँव रखते ही
मुझे पुकारा करते थे
अब किसे बुलाते हो पापा
मेरे पैदा होते ही सबके चेहरे उतरे
आपका चेहरा सुकूँ माँ ने बताया था
बड़े प्यार से रखा आपने नाम
मेरा नाम लेते नहीं थकते थे आप पापा!!!
होली हो या हो दिवाली
अपने लिए कुछ न लेते थे
मेरे लिए कपड़े-सैंडिल लाते थे आप पापा
मेरी पढ़ाई मेरे सपने मेरी शादी
मेरी जिंदगी मेरी शर्तों पर
सब पूरा करते गए आप पापा!!!
कहते थे बेटा नहीं रह पाऊँगा तुम्हारे बिन
अब मुझे बिदा कर आप कैसे रहते हो पापा
अपने घर की चिड़िया को पाल-पोसकर
भेज दिया आपने दूसरे के घर पापा
थाली का पहला निवाला मुझे खिलाते थे
अब कैसे खाते हो आप पापा!!!
मुझे डाँटने पर माँ से झगड़ा करते थे
मुझे तो भेज दिया आप ने ससुराल
अब तो आप माँ से नहीं लड़ते हो न पापा
मेरी छोटी सी चोट पर भी पूरी रात
बेचैनी से नहीं सोते थे आप पापा
आज कैसे सो जाते हैं आप पापा!!!
बेटी का असली घर होता है ससुराल
कहते थे आप मुझे पापा
कैसी लेखनी है विधाता की
बेटियों का मायका रह जाता है अधूरा
और ससुराल कभी नहीं होता पूरा
ये सोच कर और देख कर लगता है
क्या आप भी झूठ बोलते थे पापा!!!!
मेरी खुशियों खातिर पूरी
ज़िन्दगी लगा दी आपने पापा
अपनी पूरी पूँजी लगा दी आपने
आज अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में
मैं आपके पास जा भी नहीं पाती पापा!!!
आपके दिए सिख और संस्कार ही
मेरी धरोहर और आपकी यादें हैं पापा
मेरी आँखों में एक आँसू भी कभी
बर्दास्त नहीं किया आपने
क्यूँ मुझे इतना प्यार किया आपने पापा!!!

