मिसाल-ए-मऊ

मेरी माटी के अमर लाल ! कल्पनाथ

राजेश कुमार सिंह…
स्वतन्त्र स्तम्भकार

मेरी माटी के अमर लाल,
तू ही तो है वो कल्पनाथ !
तू ही हो जनक अपने मऊ के।
कोने-कोने में विकास का जाल विछाया,
मऊ को आलोकित कर पूर्वांचल को महकाया।
शिक्षालय और आवागमन का रख ध्यान।
रोजगार और विकास को तूने लक्ष्य बनाया,
बेरोजगारों को हुनर सिखाया ।
मिल और अनुसंधान की नींव रख।
विश्व क्षितिज पर पहचान दिलाया,
वही तो थे हमारे ख्वाब प्यारे।
जिससे हो गया अपनो को गुमान।
विकास के किरण में तुम बने दिवाकर,
जगमग कर दिए तिमिर सारा,
तुम कर्मयोगी पुत्र थे इस धरा के,
तुम तो वीर थे इस जहां के।
कर्मपथ पर तुम रहे अजेय अटल।
जब से गये तुम अमर लोक,
मऊ के विकास का हो गया विलोप।
एक था मैदान तेरे नाम,
जो भेंट चढ़ा राजनीति के नाम।
निहारता चहुंओर हूँ,
विकास की वाट को।
जिस पथ पर चले कोई होनहार,
बनकर विकास का झंडाबरदार।

(मेरा काव्य क्षेत्र में प्रथम प्रयास )
9415367382

2 thoughts on “मेरी माटी के अमर लाल ! कल्पनाथ

  • राजेश सिंह

    बहुत बहुत धन्यबाद एवं सादर आभार 💐

    Reply
  • शैलेश मौर्य

    मऊ का नाम ही कल्पनाथ नगर रख देना चाहिए, मऊ की बुनियाद माननीय कल्पनाथ राय जी ने रखा और उस समयकाल में विकास का हर संभव प्रयास किया जब पैसा भी बहुत कम था।

    Reply

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