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मरीज कर रहे ठेलो कि सवारी, कहाँ गए तमाम एम्बुलेंस सरकारी

(मुहम्मद अशरफ)

सरकारी सुविधाओं से अभी भी अनभिज्ञ हैं लोग

मऊ। ऐसा क्यों होता है की जब जब इंसानियत पर कोई विपत्ति आती है तो जहां एक तरफ लोग एक दूसरे की मदद और सेवा भाव में तल्लीन हो जाते हैं तो दूसरी ओर मानवता का घृणित चेहरा भी सामने उभर कर आ जाता है। शायद इंसानियत की यही दोहरी सच्चाई है। इसके अच्छे और बुरे दो पहलु। आज जनपद के सदर चौक पर एक बड़ा ही हृदय विदारक दृश्य देखने को मिला। एक बुजुर्ग अपनी वृद्ध पत्नी को ठेले पर लिटाये जा रहा था। पत्नी ठेले पर पड़ी कराह रही थी। मन कचोट सा गया। पत्रकार बंधू उस वृद्ध आदमी की दास्ताँ सुनने को दौड़ पड़े। बुजुर्ग ने अपना नाम मुस्तफा और पत्नी का नाम नूरजहां बताया। ये लोग प्यारेपुरा में एक किराये के घर में रहते हैं। मुस्तफा ने बताया कि उसकी पत्नी को पथरी है। वो उसे किसी डॉक्टर के पास ऑपरेशनके लिए ले गया था और दवाई लेकर वापस लौट रहा था। पत्नी को ठेले पर लिटा कर लाने के बाबत उसने बताया कि कोरोना कि वजह से सड़के सुनसान हैं, गाड़ियां नहीं चल रही। ऐसे में उसे ये ठेला ही मिला। अस्पताल से एम्बुलेंस न मिलने के सवाल पर उसने बताया कि उसे एम्बुलेंस सेवाओं के बारे में जानकारी नहीं है। गौरतलब है कि इस तरह के दृश्य आये दिन सडको पर देखने को मिलते रहते हैं। क्या वजह है कि सरकार के एम्बुलेंसों को लेकर किये गए दावे खोखले दिखाई पड़ने लगते हैं? वजह है, अज्ञानता। अक्सर गरीब और सरकारी सुविधाओं से अनभिज्ञ लोग इस तरह के कदम उठाते हैं। सरकार को चाहिए कि वह लोगों को अपनी सेवाओं के प्रति जागरूक करे। आम जन मानस को भी ऐसे दृश्यों को कैमरे में कैद करने कि जगह मदद करने के लिए आगे आना चाहिए। उन्हें ऐसे अनभिज्ञ लोगो को प्रेरित करना चाहिए और सरकारी योजनाओं और सेवाओं को इन लोगो तक पहुंचाने कि हर संभव कोशिश करनी चाहिए। बाकी लॉक डाउन जारी है। घरों में रहे सुरक्षित रहे। अनावश्यक सड़कों पर तफरी के मिजाज से न निकले। ये वक़्त भी जल्दी गुजर जायेगा।

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