रचनाकार

लद्युकथा: हमारी हँसी के लिए

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…

एक बार एक आदमी को फाँसी की सजा सुनाई गई। राजा ने आदेश दिया कि इस आदमी को इसकी आखिरी इच्छा पूरी कर के सूली पर लटका दिया जाय।
उस व्यक्ति को फांसी के लिए तैयार किया गया। सिपाही आपस में बातें कर रहे थे और राजा का गुणगान भी कि इस आदमी की आखिरी इच्छा पूरी कर के फाँसी का हुकुम दिया है ….राजा कितना महान है। सब तैयारियों के बाद उससे आखिरी इच्छा पूछी गई तो उसने कहा कि मैं मरने से पहले हँसना चाहता हूँ, मुझे हँसाया जाय।

सिपाहियों ने बहुत कुछ किया मगर वह आदमी नहीं हँसा । सिपाहियों में से किसी को बहरूप धरकर भी हँसाने का प्रयास किया। गायन भी कराया गया, चुट्कुले भी सुनाये गए ….पर वह आदमी नहीं हँसा।

तभी सेनापति भी वहाँ आ पहुंचा और उसने भी समस्या को सुना। तब उसने पूछा कि यह अपराधी करता क्या था ? सैनिकों के एक प्रमुख ने बताया कि ये आदमी कविता कहता था और लोगों को भड़काता था ….साला न जाने कहाँ से हर योजना पर कुछ न कुछ कमी ढूंढ लेता था।

सेनापति समझदार था। उसने किसी को बुलाने का आदेश दिया । जब उसका नाम लिया तो सभी लोग हंसने लगे , मगर वह फाँसी पर चढ़ाये जानेवाला आदमी तब भी नहीं हँसा । जिस आदमी को बुलाया गया था वह आदमी बुद्धिमान भी था महा झूठा भी। उसने समस्या को तुरंत समझ लिया और आते ही बोला -“सेनापति जी ! महाराज की घोड़ी ने युवराज को जन्म दिया है, इसलिए इस कैदी को छोड़ दिया जाय , ऐसा महारानी साहिबा ने आदेश दिया है।”

वहाँ खड़े लोग ज़ोर से ठहाका लगाकर हँसे क्योंकि राजा ने शादी नहीं की थी और मजेदार बात ये भी थी कि घोड़ी युवराज कैसे पैदा कर सकती थी, और बोलकर आदेश कैसे दे सकती थी।

वह अपराधी समझ चुका था कि अब मौत निश्चित है, धूर्तता को वह समझ गया था सो वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा । अब सैनिक और सेनापति खुश थे। अपराधी फाँसी पर चढ़ा दिया गया, तब एक सैनिक ने पूछा कि वह आदमी हँसा क्यों ?

“मूरखों में रोज-रोज मरने से अच्छा है कि एक बार में मर जाओ और दूसरा कारण था सच की कीमत चुकाना…. वो हमारी हँसी के लिए फाँसी चढ़ गया ।” और सेनापति उदास सा बाहर चला गया।

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