अगर वे प्रत्याशी नहीं बदल सकते तो हमी सांसद बदल देते हैं…?
@अरविंद सिंह [घोसी लोकसभा सीट की व्यथा-कथा]
Live@covereg
◆ कल जब आजमगढ़ से हम घोसी सीट को कवरेज करने निकले तो शाम को कोई पांच बज रहे थें। हमारे साथ,पत्रकार साथी वसीम अकरम और अभिषेक सिंह थे। ठीक 20मिनट बाद हमारी गाड़ी घोसी लोकसभा क्षेत्र के विधानसभा क्षेत्र मुहम्मदाबाद थी। विधानसभा की यह सीट सुरक्षित है। भाजपा के श्रीराम सोनकार यहाँ से विधायक हैं। इस क्षेत्र में कोई औद्योगिक इकाई नहीं है। मोहम्मदाबाद गोहना टाउन एरिया है। टाउन क्षेत्र में मोदी का जादू आज भी बरकरार है।लेकिन लोग अपने सांसद हरिनारायन राजभर से बहुत दुखी हैं। जबकि यहीं से जैसे ग्रामीण क्षेत्र में बढ़िए तो गठबंधन के प्रत्याशीे अतुल राय जो बसपा कोटे से हैं,लोगो की पहली पंसद होते हैं।कारण वे मुददे की बात करते हैं। हमारी टीम लोगो से बात करते,ग्रामीण क्षेत्रों के सामान्य मतदाताओं जिनकी आस्था किसी पार्टी विशेष की ओर नहीं दिख रही थी, वह यह जानना चाहते हैं कि अगर मोदी जी देश के प्रधानमंत्री होते हुए लोगो से मिलते हैं,वाराणसी बार बार आते हैं, फिर उन्ही के दल का सांसद हमारे सुख दुख में क्यों नहीं पहुँचता है। बात करते करते हम मऊ विधानसभा क्षेत्र में प्रवेश कर गये।
इस सीट से बाहुबली मुख्तार अंसारी बसपा से विधायक हैं।यह मुसलमान और दलित बहुल इलाका है। पिछली बार विधानसभा में ओमप्रकाश राजभर के दल सुभासपा का प्रत्याशी दूसरे स्थान पर और सपा के अल्ताफ अंसारी तीसरे स्थान पर थे। आज सपा और बसपा का गठबंधन है।और छड़ी निशान वाले सत्ता के सौदागर ओमप्रकाश राजभर भाजपा सरकार में मंत्री हैंं लेकिन चुनाव में भाजपा के खिलाफ हैं यानि गठबंधन की गांठ खुल गई है। और राजभर जी भाजपा सरकार को पानी पी पी कर गाली दे रहे हैं।यह अलग बात है कि चुनाव बाद उनकी मुसिबते बढ़ा सकती है भाजपा सरकार।
हम इसी सियासी उधेड़बुन में कोपागंज पहुँच गये।लोगो से बाते की और जानने की कोशिश की इस बार ऊट किस करवट बैठेगा।कस्बों और बाजारों में भाजपा की स्थिति मजबूत दिखती है लेकिन जैसे ही गांव की ओर बढ़ते हैं, हरिनारायन के सम्मान में जिन शब्दों का गंवई प्रवाह निकल रहा है।वह पूर्वी पट्टी के लोग समझ सकते हैं कि आक्रोश में कैसे गंवई आदमी भाषा की सामान्य मर्यादा भी तोड़ देता है।
यह उस मतदाता का स्वाभाविक प्रतिरोध होता है,जो अपने साथ हुए छल या वादखिलाफी को चुनावी मौसम में स्वतःस्फूर्त निकलता है। गांव इस समय गेँहू की मँडाई और भूसे के गर्दो गुबार से पटा दिखायी देता है। बड़े काश्तकारों ने तकनीक का प्रयोग कर मशीनों गेहूँ को काटकर घर भीतर बखारी और गोदम में रख लिया है लेकिन छोटे और सीमांत किसान अभी आग बरसते सूरज के नीचे,खेतों में दिखायी देते हैं।यहाँ बुनकरों की अच्छी आबादी है,जिनके लिए बिजली और करघा ही माई बाप होता है,जिसके रूठने पर जैसे जिन्दगी ही रूठ जाती है।
हालाँकि मास मुसलमानों का यह वोटिंग ट्रेंड होता है कि वह सीटवार उस प्रत्याशी को वोट करता है, जो भाजपा को हराने में सक्षम हो या उससे लड़ते हुए दिख रहा हो। हम आगे बढ़ते जा रहे थे और सड़कों के दोनों किनारों पर उग आये बाजारों, कस्बों के सामाजिक मनोविज्ञान को भी समझ रहे थे। यह भी देख रहे थे कि कैसे गांव पहले सड़क पर आता है और फिर कैसे सड़क कस्बा बनाती और कस्बा नगरों का अंधानुकरण करते हुए नगर बनने की कोशिश करने में अपनी मौलिकता और पहचान से दूर होते जा रहे हैं। वे नगर बन नहीं पाये और गाँव रह नहीं सके।
लेकिन आज भी हमारे गांव और कस्बों में रागदरबारी के लगभग सभी चरित्र बदले स्वरूप में मिल जाते है।
अब हमारी गाडी रतनपुरा होते हुए आग बढ़ती जा रही थी। कुछ समय के बाद हम रसड़ा में थे।यह एक आदर्शनगर पालिका है।और विधानसभा सीट भी। नगर पालिका परिषद के ठीक सामने गाँधी पार्क है जिसमें गांधी जी की एक प्रतिमा लगी और उसके पीछे एक विशाल पोखरा है।इस पोखरे में पानी निकासी और भरने की अच्छी व्यवस्था है।चारों ओर सीढ़ियाँ हैं और बैठने के लिए पत्थरों को बेंच व कुर्सियाँ लगी हैं।सार्वजनिक शौचालय की व्यवस्था नगर पालिका की ओर से है।वशिष्ट नारायण सोनी इस नगर पालिका के चेयरमैन हैं,जिसके प्रयासों से यह रसड़ा का एक सार्वजनिक और खूबसूरत तथा मनोरम जगह बन सकी है,जिसमें नगर की आबादी समय बिताने का लिए आती है। और खुली हवा में सांस लेती है।
यह क्षेत्र बलिया का औद्योगिक क्षेत्र भी है। लेकिन उद्योग की स्थिति यह है कि नया उद्योग तो स्थापित नहीं हुए लेकिन जो थे, वे भी दम तोड़ दिए हैं। चीनी मिल, कताई मिल और रेलवे का माल गोदाम सभी बंद पड़े हैं। जिसे ना तो पिछली सरकार ने इसे खोलने की कोशिश की और ना ही हमारे समय की योगी और मोदी सरकारों ने भी।हालात तो यह है कि भाजपा के सांसद पाँच सालों में एक बार भी इस क्षेत्र में झांकने तक नहीं आए।लोगो का कहना है कि भाजपा ने दोबारा हरिनारायन राजभर को टिकट देकर भारी गलती है।अगर वह प्रत्याशी नहीं बदल सकती तो हमी सांसद बदल देते हैं।
उद्योग की स्थिति मऊ में भी,रसड़ा से बेहतर नहीं है। जिला मुख्यालय पर स्वदेशी काटन मिल है,जो पहले जयपुरिया की थी,बाद में भारत सरकार ने अधिग्रहण कर लिया। यह मिल भी पिछले एक दशक से बंद पड़ी है।भारत सरकार के टेक्सटाइल विभाग की उपेक्षा से यह इकाई अब खंडर बन चुकी है। वहीं परदहा की कताई मिल भी बरसों से बंद पड़ी है।ले देकर घोसी चीनी मिल पर ही औद्योगिक इकाई होने की दारोमदरार है।
हजारोंं परिवारों के लिए जीवन आधार ये इकाईंया भर नहीं बंद हुईं बल्कि इससे लोगो की उम्मीदे भी धराशायी हुईं और सियासत का छल नग्न होता गया।
अंत में..
“किसी ने लिखा आँसूओं से कहानी/किसी ने पढ़ा बस दो बूँद पानी।।”

