डा.महादेव वर्मा! आजादी के वे दीवाने, जिन्हें भुला न पाओगे

० पंडित जवाहर लाल नेहरू के संगत में रहे,काटी थी 6 माह की सजा भी
०1962 व 1967 तक सांसद और लोकसभा के उप सचेतके भी रहे डा. वर्मा
@सुमित मोहन…
महराजगंज। आजादी के आंदोलन में पंडित जवाहर लाल नेहरू के संग अहम भूमिका निभाने वाले फरेंदा निवासी डा०महादेव प्रसाद वर्मा को भुला पाना आसान नहीं है। पं. जवाहर लाल नेहरू जैसी शख्सियत के अनुरोध पर दो दो बार लोकसभा का चुनाव लड़ने से इन्कार कर चुके महराजगंज के इस वीर सपूत वह स्वतंत्रता सेनानी को गुमनामी ही मिली। किसी भी वाजिब मौके पर जिला प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक को जिले के इस सपूत की याद नहीं आती।
आजादी की जंग में इनके योगदान का लंबा चौड़ा इतिहास है। आजादी की जंग के जुर्म में अंग्रेजो ने इन्हें 20 अगस्त 1942 से 25 फरवरी 1943 तक सेंट्रल जेल गोरखपुर में कैद कर रखा था। इस अवधि तक वे सजायाफ्ता थे। सजा पूरी होने पर भी उन्हें रिहा नही किया गया तो वे जेल से फरार हो गए। बाद में पकड़े जाने पर इन्हें जेल में ही काफी यातनाएं दी गई थी। इसी दरम्यान वे पं.नेहरू के संपर्क में आ गए। इसके बाद आजादी की जंग वे खुलकर लड़े और खूब लड़े।

डा०वर्मा शिक्षा में भी अग्रणी थे,सेंट एंड्रयूज डिग्री कालेज गोरखपुर में अंग्रेजों से लोहा लेने वाले एक और योद्धा प्रो शिब्बन लाल सक्सेना ने इनको पढ़ाया था।पी.एच.डी. करने के बाद डा.वर्मा गोरखपुर विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र के विभागाध्यक्ष हुए। आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहने के बाद भी वे चुनाव नही लड़े। उनके न लड़ने से महराजगंज संसदीय क्षेत्र से 1952,1955 व 1957 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस हार गई थी। बाद में इंदिरा गांधी के कहने पर वे प्रोफेसर जैसे मान सम्मान वाली नौकरी छोड़ कर 1962,1967 में चुनाव लड़े। दोनों ही चुनाव में वे विजई हुए। इसी दौरान वे लोकसभा में उप सचेतक भी रहे।1962 में इंदिरा गांधी भी इनके घर आई थीं।
नामचीन पार्लियामेंट्रीयन रहे डा.वर्मा की लिखी हुई 4 किताबें “सोशल फिलास्फी आफ महात्मा गांधी”, “समाज दर्पण”,”प्रताप प्रतिज्ञा”,”उतराधिकार” आज भी गोरखपुर विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती है।
देश में आर्थिक तंगी को देखते हुए 1965 में डा०महादेव वर्मा ने अपनी लिखी हुई नाट्य पुस्तक प्रताप प्रतिज्ञा का मंचन किया जिसमे उन्होंने स्वयं अकबर की भूमिका निभाई थी। कहना न होगा कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी डा.वर्मा कुशल थिएटर कलाकार भी थे। डा.वर्मा के प्रताप प्रतिज्ञा मंचन से कुल सात लाख रुपया इकट्ठा हुआ जिसे उन्होंने प्रधान मंत्री राहत कोष में जमाकर एक मिशाल कायम किया था।
डा० वर्मा के पुत्र राहुल वर्मा ने बताया की इतनी बड़ी कुर्बानी के बाद भी उनके परिवार को कोई पहचान नहीं मिली। डा० वर्मा के भतीजे हर्षवर्धन वर्मा ने कहा की उपेक्षा का हाल यह है कि नगर पंचायत बनने के बाद डा.महादेव वर्मा के नाम पर एक वार्ड तक नही है। उन्होंने बताया की अफसोस है की आजादी के 75 वें वर्ष में अमृत महोत्सव मनाने वालों को भी डा.वर्मा की याद नहीं आई।

