खास-मेहमान

युवा तुर्क सहजा का यह पड़ाव भर है, मंजिल तो कहीं और है..!

० सुनो मिस्टर पालिटिक्स! सहजानंद की सही जगह-सदन है!

@डा. अरविन्द सिंह #त्वरित टिप्पणी
अभी कल-परसो की ही तो बात है। आजमगढ़ के लीडराबाद स्थित राजेन्दर के दुकान के बाहर भाजपा के पूर्व जिलामंत्री अनुजवत रविशंकर तिवारी से किसी मुद्दे पर गुफ्तगू हो रही थी, तभी अपनी गाड़ी पर सवार सहजा जी, कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ते दिखाई दिए। हमारी आंखें मिलीं अभिवादन हुआ और गाड़ी आगे जाकर रुक गई। चंद पलों में हमारे सम्मुख सहजा, हमारे मुश्किल वक्त के साथी पारितोष, और कुछ और युवजनों की भीड़ सहजा के साथ। चाय के साथ हमारा आंशिक संवाद।
पूछा – “क्या हाल है सर!,(मेरे सवाल में गहरे निहितार्थ छिपे थें,जो प्रायः उनके उद्देश्यों को वे संकेतों की भाषा से बखुबी समझ भी जाते हैं)
जवाब में एक सकारात्मक अभिव्यक्ति। पार्टी का कार्यकर्ता हूं, पार्टी जैसे चाहे युज करें.”
एक गहरी सांस के साथ सहजा का बढ़ा हुआ आत्मविश्वास यह बताने और संकेतों की भाषा समझने के लिए काफी था कि -अगले एक-दो दिनों में कुछ सुखद समाचार सुनने को जरुर मिलेगा। और फिर बीते दिन की देर शाम जैसे ही उत्तर प्रदेश भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के हस्ताक्षर से पदाधिकारियों की सूची जारी हुई, उसमें एक बहुप्रतीक्षित सूचना मिली, सूचना यह थी कि -” सहजानंद राय को क्षेत्रीय अध्यक्ष- गोरखपुर क्षेत्र बनाया गया”। हांलांकि की अबतक वो क्षेत्रीय मंत्री पद पर थें। यह सूचना हम जैसे लोगों को भीतर तक रोमांचित कर गयी। क्यों कि संघर्ष को इतने लंबे इंतजार के बाद ही सही, सम्मान तो मिला। बदलते दौर की नई भाजपा ने एक आम आदमी को, यूं कहें कि ज़मीनी कार्यकर्ता को महत्वपूर्ण पद पर बैठा कर, निराश और हताशा भरे माहौल में युवाओं में नई उम्मीद जो भर दी।
सहजा, सरल, सहज, संघर्षशील और कार्यकर्ताओं के नेता हैं। यही उनकी पहचान और ताकत भी है। उनके पास पूंजी नहीं है, कार्यकर्ता ही अबतक के जीवन का सबसे बड़ा पूंजीनिवेश हैं। जिसके बल पर संगठन में एक मजबूत सिपाही बनते चले गएं।सच तो यह कि एक साथ कार्यकर्ताओं से जितनी तेजी और सहजता से सहजा कनेक्ट होते हैं,यह विधा और कला नये जमाने के नेताओं में कम ही बची है। सहजानंद उसके अपवाद स्वरूप उदाहरण हैं। गंवई परिवेश से निकल कर एक नौजवान का सुदूर जिला मुख्यालय आजमगढ़ पहुंचना, और लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई छात्रसंघों से संवरती सीरत और सियासी ककहरें ने उन्हें इस मुकाम तक तो पहुंचा दिया। संघर्ष के बूते यह भी विश्वास हो चला कि आगे सदन में पहुंचते देर नहीं लगेगी। ऐसा आभास केवल मुझे नहीं बल्कि पूरे आजमगढ़ को हो चला है। उन्हें भी जो सहजा के राजनीतिक मित्र-शत्रु हैं। हालांकि सहजता में सहजा दलीय तटबंधों को तोड़ देते हैं। यह उनके व्यक्तित्व की विराटता और विशेषता है। यह सहजा की सहजता का एक रूप है। जो अपने हजारों-हजार कार्यकर्ताओं को, नाम सहित पहचान और बुला सकते हैं। इसके पीछे उनका छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि और विद्यार्थी परिषद की दीक्षाएं हैं। वे अपने लोगों को देखकर कहीं भी खड़े हो सकते हैं और उनके लिए आखिरी हद तक लड़ सकते हैं। इस मामले में उनकी छवि हमेशा एक जननेता की सी हैं। युवा तुर्क..एक लड़ाका। उनका तेवर और कलेवर ही पहचान है।

मेरे जैसे लोग संघर्ष को सदा से सलाम करते आएं हैं और ऐसी सफलताओं में अपनी सफलता देखते हैं। आम आदमी की सफलता। शायद सहजानंद राय की असली कमाई यही है उनकी सफलता को सभी ने मुक्तकंठ से महसूसते हुए सराहा है, जिसमें नेता कम , कार्यकर्ता ज्यादा है। सोशल मीडिया पर उनको बधाई प्रेषित करते संदेश इस बात के सबूत है कि उन्हें लोग किस कदर चाहते हैं।
सहजानंद का संघर्ष एक मध्यम वर्गीय परिवार के युवा का संघर्ष है,उसके सपने हजारों, लाखों आंखों के सपने हैं। तिजारती होती सियासत में भी बेहतर भविष्य के सपने बूनने वाली उम्मीद भरी आंखों के सपने हैं। इन सपनों का जीवित रहना,जीवंत और संवेदनशील समाज की निशानदेही है।
पंजाबी शायर अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की ये पंक्तियां कई मायनों में संजीव हो उठती हैं-
“सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर और
काम से लौटकर घर जाना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना”

सहजानंद ने बहुतों के सपनों को जीया और भोगा है। बहुतों की उम्मीदों को पंख दे दिया है। मुझे आज भी याद है दशकों का उनका संघर्ष। भाजपा को उस दौर में स्थापित करने के लिए संघर्षरत एक युवा सड़कों पर पसीने बहा रहा है। उसके संघर्ष की दास्तां का जब भी सही मूल्यांकन होगा, ये पद और कद बौना नज़र आएंगे। सहजा के संघर्ष का सही सम्मान सदन है। जो संगठन से होते हुए आगे बढ़ता नज़र आ रहा है। हार्दिक शुभकामनाएं दोस्तों के दोस्त!

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