पुण्य स्मरण

कैसे कह दूँ कि कल्पनाथ हैं ये!

मेरी कलम से…
आनन्द कुमार

तुम इन्हें सँजाने-सँवारने,
इनकी विकास की विरासत को
बचाने की बात करते हो।

तुम इनके रास्ते पर चलकर,
इन जैसा बनने की कोशिश करते हो,
पर कैसे कह दूँ कि कल्पनाथ हैं ये!

हमें पता है—
तुम्हारे अंदर
पत्थर को तराशने का हुनर नहीं है।
तुम इंसान तराश सकते हो,
लेकिन पत्थर नहीं!

लेकिन क्या तुम्हें
कोई ऐसा न मिला,
जो हूबहू कल्पनाथ को तराश सके?

इतने बड़े कार्यक्रम की हर रूपरेखा—
कौन आएगा, कौन नहीं,
सब कुछ तय किया होगा तुमने।

एक पल उसके लिए भी तो
निकाल लिए होते,
जिसके लिए यह सब कर रहे थे तुम!

तुम तो कहते हो—
हम कल्पनाथ को जीते हैं।
क्या यही जीते हो तुम?

सच का कल्पनाथ बनना तो मुश्किल है,
लेकिन एआई और आधुनिक युग में
पत्थर में भी कल्पनाथ
तराश नहीं पाए तुम!

घूम लेना मऊ में,
एक नज़र देख लेना—
बहुत-सी मूर्तियाँ लगी हैं कल्पनाथ की।

संभव हो तो
कल्पनाथ-सी ही कोई मूर्ति लगा देना तुम।

ज़िंदा तो नहीं ला सकते,
कम-से-कम पत्थर में ही
हूबहू कल्पनाथ ला देना तुम…

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