अपना भारत

“543 से 850: विकास या राजनीतिक गणित?”

आनन्द कुमार…

बिल्कुल, आप जितना चाहें उतनी सीटें बढ़ा दीजिए—उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन इतना ज़रूर बताइए कि सीटें बढ़ाने की ज़रूरत क्यों है? क्या सांसदों की संख्या बढ़ने से देश और क्षेत्र वास्तव में बदल जाएगा? क्या इससे विकास की कोई स्पष्ट और सरल रेखा खींची जाएगी?

क्या वर्तमान में सांसदों को उनकी माँग के अनुरूप विकास के संसाधन मिल रहे हैं? विपक्ष को छोड़ भी दें, तो क्या सत्ता पक्ष के सांसदों के क्षेत्र सच में चमक और दमक रहे हैं? या फिर यह सब केवल एक नया राजनीतिक प्रयोग है?

क्या आपने यह सोचा है कि सांसदों की संख्या बढ़ने पर कितना अतिरिक्त खर्च आएगा? और अगर यह विधेयक लागू हो गया, तो क्या यह कभी वापस लिया जाएगा? क्या आने वाली पीढ़ियों पर इसका आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा?

अगर इस विधेयक का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्ति है, तो यह भी समझना होगा कि जातीय या क्षेत्रीय आधार पर सत्ता सुख पाना कोई स्थायी उपलब्धि नहीं है। सत्ता भले ही मिल जाए, लेकिन जनविश्वास के बिना वह टिकती नहीं।

जनता के दिल पर हाथ रखकर नहीं, बल्कि अपने दिल पर हाथ रखकर यह पूछिए—2014 से अब तक, डबल इंजन से लेकर ट्रिपल इंजन की सरकार बनने तक, जनता को क्या मिला?

हम यह नहीं कहते कि आपमें कोई दोष है, लेकिन यह भी सच है कि मन आपको पूरी तरह सफल मानने को तैयार नहीं है। कुछ अच्छे कार्यों के आधार पर आपको एक बेहतर शासक कहना कठिन है।

और हाँ, Jawaharlal Nehru, Indira Gandhi, Rajiev Gandhi, Atal Bihari Vajpayee या Manmohan Singh से मैं आपकी तुलना नहीं करता। लेकिन 2014 में देश की जनता ने आपसे इन सभी से बेहतर की उम्मीद की थी—उसमें मैं भी शामिल था। आज यह कहने में संकोच नहीं कि आप उस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे।

आप संसद में सांसदों की संख्या चाहे जितनी बढ़ा लें, लेकिन यदि देश की तरक्की के लिए स्पष्ट विजन नहीं होगा, तो सब व्यर्थ है। यह याद रखना चाहिए कि कोई भी अमर नहीं है। ऐसे फैसले न हों जो आने वाली पीढ़ियों के लिए बोझ बन जाएँ।

जय श्री राम।

 

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