माँ! तुम्हारे नाम मेरे सब उजाले…


ओमा The अक्©…
माँ!
बहुत हूँ व्यस्त
उस जीवन में
जो तुमने दिया है
इसलिए
संग बैठ कर
यह पूछने का भी समय
मिलता नहीं है
“तुम हो कैसी
क्या तुम्हरा हाल है
क्या सोचती हो इन दिनों
खाली समय में!”
यूँ कोई सर पर उठाए
बोझ जीवन का
नहीं मैं चल रहा हूँ
ना तो कोई कष्ट है
आशीष तेरा
सर्वदा मुझको
सुखी रखता रहा है!
किन्तु यह सबन्ध सारे
जगत के बंधन
मुझे उलझाए रखते हैं
मेरी सब वासनाएँ
कामनाएँ
स्वप्न के संघर्ष
मुझको पाश में ले कर
बिता देते हैं पल-पल
मुस्कुराते
गुनगुनाते
सब मुझे बहलाए रहतें हैं/
किन्तु जब भी दर्द उठता है
कोई भी देह का
स्नेह का
तब क्यूँ तुम्हारा नाम आता है
मेरी जिह्वा पे
गङ्गाजल सरीखा
हृदय मेरा तुष्ट होता है
तुम्हारे होने के एहसास से
इस आस से
कि तुम कहीं बैठी हुई
मेरे लिए “शिवमंत्र” जपती हो
मेरे हर दुःख को
हरने का है सामर्थ्य तुममें/
माँ!
मेरी अम्मा!
मैं तुमसे दूर हूँ वैसे
कि जैसे वृक्ष
अपना सर उठाए
गर्व से है डोलता
विस्तृत गगन में
और आँखें चार करता
नभचरों से
सूर्य से साहस भिड़ाता
मेघ के मुख चूम कर के
खिलखिलाता
किन्तु रहता है
उसकी धरती से
अपनी नाभ जोड़े
जिसने अपनी कोख से उसको जना था
जिसके भीतर आसरा पा वो बना था
है मेरी भी नाभ
अबतक यूँ जुड़ी तुमसे
कि मैं ज़िन्दा रहा हूँ
और जियूँगा
जबतलक तुम हो मेरी जड़ सींचती
मुझको संभाले
माँ! तुम्हारे नाम मेरे सब उजाले…!!”
५ फ़रवरी २०२२
(ओमा द अक अपनी माँ विद्यावति देवी के जन्मदिन पर स्वरचित)

