शब्द मसीहा! नम आँखों की सेल्फी

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…
“हेल्लो ! क्या मसीहा जी से बात हो रही है ?” किसी अनजान नंबर से फोन था .
“जी , कहिये .”
“मुझे आप बहुत पसंद हैं . आपकी बातें मेरे दिल ओ ज़िगर को चीर देती हैं . मुझे मालूम न था कि कोई गुमनाम सा लेखक भी इतना खूबसूरत सोच सकता है .”
“बहुत शुक्रिया आपका . कहाँ से बोल रही हैं आप ?” स्वर बहुत ही मीठा था और आवाज से लगता था कि उम्र भी बीस पच्चीस साल की रही होगी .
“मैं दिल्ली से ही बोल रही हूँ . एक रिक्वेस्ट करनी है आपसे . “
“कहिये !”
“मुझे आपकी सारी किताबें चाहियें और आपके साइन के साथ . बताइए कहाँ मिल रहे हैं ?”
“मैं आपसे अभी न मिल सकूँगा , बहुत व्यस्त हूँ . हाँ, आप अपना पता मुझे दीजिये , मैं किताबें भेजता हूँ आपको .”
“नहीं , मुझे पसंद आ गए हैं . मिलना ही है मुझे . सच कहूँ तो प्यार हो गया है आपसे मुझे . आप मजाक मत समझिएगा , मैं झूठ नहीं कह रही हूँ .” स्वर काँप रहा था और आवाज भी भारी हो गई थी अचानक . मैं भी कुछ देर खामोश रहा था .
“क्या करती हो तुम ? कहाँ रहती हो ?”
“मैं पी एच डी कर रही हूँ . साहित्य ही मेरा सब्जेक्ट है और नार्थ केम्पस में हूँ .”
“हम्म्म …. तुम्हें मालूम है कि मैं किस उम्र का हूँ ? शायद तुम्हारी उम्र के मेरे बच्चे हैं . ये प्यार ठीक नहीं है . मैं तुम्हारे लायक नहीं . क्षणिक आवेश है , गुजर जाएगा .”
“ऐसा नहीं है . मैं सीरियस हूँ . ये मन का रिश्ता है . इसमें कोई वासना नहीं है . आपको पढ़कर इतना तो समझ सकी हूँ मैं कि आप अच्छे नहीं बहुत अच्छे इंसान हैं पर दिल से आपको प्यार करती हूँ सत्ताईस साल की हूँ मैं . पापा नहीं हैं . माँ है , बिजनेस करती हैं . माँ मेरी बहुत प्यारी दोस्त हैं .”
मैं बहुत हैरान और परेशान था कि इसे क्या जवाब दूं . सच बात ये भी है कि मन में मेरे भी इच्छा थी कि मैं इसे देखूं कि आखिर ये है कौन ?
“क्या हुआ ? क्या सोच रहे हैं आप ? कुछ तो कहिये ? मना मत कीजिये .”
“आपका नाम क्या है ?”
“उसमें क्या रखा है ? मैं जानती हूँ आपके लिए वो कोई मायने नहीं रखता . आप किसी और सोच में हैं शायद .”
“पुकारूँगा किस नाम से ? मिलोगी तो क्या कहूंगा ? कैसे जानूंगा कि तुम हो ?”
“कहाँ मिलना है ? मैं आ जाउंगी ?”
“ठीक है . मैं एड्रेस भेजता हूँ . कोई गिफ्ट या दूसरी चीज नहीं लाना . दोस्तों से दोस्ती के अलावा कुछ नहीं चाहिए . तुम्हें आने से पहले एक गिफ्ट देना चाहता हूँ , फोन को अपने माथे से लगाओ .”
“लगा लिया .” मैंने धीरे से एक चुम्मा लिया .
“क्या किया आपने ?”
“तुम्हारा माथा चूमा है मैंने . तुम्हें दोस्त मान लिया है . अब तुम कभी भी आ सकती हो . बेटियाँ बाप से घर आने का समय नहीं पूछतीं आ जातीं हैं .”
“मैं आ चुकी हूँ . शिव साईं हनुमान मंदिर के सामने खड़ी हूँ . आपकी इजाजत का इंतज़ार कर रही हूँ .”
“मैं आता हूँ बाहर .” मैं फोन लिए कमरे से बाहर आया . सामने जो लड़की खड़ी थी उसकी ओर इशारा किया . फोन अभी भी चालू था .
“आपसे मुझे मिलना ही था कैसे भी .” मैं उसे लेकर घर आ गया .
“बैठो !”
“इतनी किताबें ! कैसे पढ़ते हैं आप ?”
“हा हा हा ….अच्छा लिखने के लिए पढना भी बहुत जरुरी होता है . तुम से बेहतर कौन समझ सकता है इस बात को .”
मैं उठकर रसोई में जाने लगा तो वह बोली –
“क्या मैं चाय बनाऊं आपके लिए ? प्लीज .”
मैं सच मानिए तो मना कर देना चाहता था . पर कुछ सोचकर रुक गया था . दिमाग में अब भी कई सवाल कौंध रहे थे . कुछ ही देर बाद चाय के दो गर्म प्याले टेबल पर थे . मैंने सिरहाने से बादाम और किशमिश का डिब्बा रखते हुए कहा – “खाओ , सर्दी बहुत है .”
उसने मुझे देखा और धीरे से बादाम उठाकर खाने लगी . सुर्ख होंठ और गुलाबी रंग . मैं खुद उस ऊपर वाले को धन्यवाद दे रहा था उसकी बनाई इस कल्पना के के लिए .
“बहुत अच्छी चाय बनाई है .”
“थैंक्स . अब आदत हो गई है . अकेली रहती हूँ , सो खुद ही बनाती हूँ . घर में और कौन है ?”
“दो बेटे हैं , पत्नी टीचर हैं . अभी घर में अकेला हूँ मैं . सब दोपहर बाद आयेंगे .”
“तो क्या मैं खाना भी बनाऊं ?” वह मुस्कुराते हुए बोली .
“हा हा हा ….अरे! नहीं . खाना रखा है . सुबह ही बनाकर गईं हैं .”
“ओह ! क्या मैं खा सकती हूँ ?”
“हा हा हा …..क्यों नहीं . बैठो , मैं लेकर आता हूँ .” मैं रसोई में चला गया . परांठे ओवन में गर्म किये , दही, अचार के साथ प्लेट में रखकर ले आया .
“दही नहीं ,” और परांठे के साथ उसने अचार को मसलकर रोल बना लिया . आनद के साथ वह परांठा चाय के साथ खाने लगी . टुकुर-टुकुर बस मुझे ही देखे जा रही थी .
“अच्छा , एक बात बताओ कि तुम ऐसी ही हो या मुझे बुद्धू बना रही हो .”
“हा हा हा …मैं ऐसी ही हूँ . आप मेरे फोन से जरा फोटो खींचिए मेरा .” मैंने मोबाइल से फोटो खींचा .
“हाँ, अब बताओ .”
“बात ये है कि जब आपकी कहानियाँ मैं पढ़ रही थी तब मेरी दोस्त ने चेलेंज किया था कि आप सिर्फ अच्छा लिखते हैं , कोई भी लेखक उतना अच्छा नहीं होता जितना अच्छा सोचता है . तब मैंने कहा था कि ऐसा नहीं है . न जाने क्यों आप पर मुझे भरोसा था .”
“क्या भरोसा था ?”
“यही कि आप किसी की शक्ल से ज्यादा उसके विचार को पकड़ते हैं .”
“तो क्या पाया ?” मैं अपने को पास या फेल होने को जान लेना चाहता था जैसे .
“आप अपनी कहानियों की तरह सरल और साफ़ हैं , मेरी उम्मीद पर खरे उतरे हैं आप . मुझे आपसे यही उम्मीद थी .”
“पर तुमने ये नौटंकी क्यों की ? सीधे भी तो कह सकतीं थीं .” मैंने चाय पीते हुए सवाल किया .
“तब क्या वो सब होता …जो आपके मन में हुआ ? मैं जानती हूँ आपके दो बेटे हैं . आपके कई वीडियो देखे हैं . मेरे कई सवालों के जवाब तो मिल गए हैं लेकिन एक सवाल का जवाब नहीं मिला .”
“वो क्या है ?”
“वो सवाल है कि आप इतने डरे से क्यों रहते हैं ? मैं लड़की हूँ ये जानकर आप बचाव की मुद्रा में आ गए थे . आप प्यार करने को कहते हैं और प्यार से दूर भी भागते हैं . ऐसा क्यों ?” अब उसकी निगाहें मेरे चेहरे पर टिकी हुई थीं और वह जैसे मुझे पढ़ रही थी .
“ये सच है . हर शरीफ आदमी बचाव की मुद्रा में होना ही चाहिए और इस तरह की बात से परहेज करना चाहिए . प्यार का मतलब हम लोग गलत निकाल लेते हैं . वह आकर्षण से शुरू होकर देह पर दम तोड़ देता है . प्रेम एक निरंतर प्यास का बने रहना है . उसमें जलने में मजा है . विरह प्रेम का चरम है और हम मिलन को प्रेम समझते हैं . जब तक तुम मिलीं न थीं तब तक तुम्हारी उत्तेजना असंयम और दिशाहीन थी मगर अब तुम शांत भी हो और खुश भी . ये सारा परिवर्तन तुमने खुद किया है . हमारे अन्दर कोई दूसरा परिवर्तन नहीं ला सकता . अपने लिए हम ही परिवर्तन लाते हैं .”
“वो कैसे ?”
“आज के बाद तुम कभी भी आ सकती हो . ये तुमने कमाया है . तुमने अपनी सोच जाहिर की , मैंने उसका आदर किया और तुम्हें नाराज या दुखी भी नहीं किया . तुमसे मिला भी , तुम्हारा दोस्त भी हूँ अब और जहाँ चाहो मिल भी सकता हूँ . मुझे कोई डर भी नहीं और अब शायद तुम्हें भी नहीं होगा डर . प्रेम में आदमी मजबूत होता है डरपोक नहीं . प्रेम में शर्त नहीं होती , शर्तों का त्याग होता है या कहो कि त्याग ही प्रेम होता है .” मैंने उसकी खूबसूरत और उत्सुक आँखों में झांकते हुए कहा .
“आप सच कहते हैं . मुझे डर था मगर मेरा औरत होना मेरे लिए सुरक्षा थी . मेरी सुन्दरता मेरा अस्त्र , मैं आश्वस्त थी . मगर आप पर इनका कोई असर नहीं होगा , ये भी मैं जानती थी . आपके लेखन में और आप में कोई फर्क नहीं है . मुझे ख़ुशी हुई .”
“अब नाम तो बता दो अपना . झाँसी की रानी …हा हा हा .”
“आप ही तो कहते हैं बेटियाँ एक जैसी होती हैं . दोस्त बेटी का नाम कुछ भी रख दो …हा हा हा .”
“ठीक है , मैं तुम्हें चंचला कहूँगा .”
न जाने क्या हुआ था . उसकी आँखों से मोटे-मोटे आंसू टपकने लगे थे .
“क्या हुआ ? रो क्यों रही हो ?” मैंने पूछा .
“मेरा नाम चंचला ही है . पापा ने रखा था .”
अब मैं खुद को रोक नहीं पाया . मैंने उसके सिर को सहलाया और अपने सीने से लगा लिया . भीने से परफ्यूम की तरह ही एक बेटी का प्यार मेरे सीने में हिलोर मारने लगा था . गालों पर आये आंसुओं को पोंछ दिया और बोला –
“ये सामने हैं सभी किताबें , जो भी चाहिए ले लो . मेरी तरफ से गिफ्ट है तुम्हारे लिए .”
“वो तो मिल गया मुझे अभी . किताबें तो सिर्फ अहसास के लिए लूंगी पर पूरा लेखक ही जिसे मिल जाय उसे और कुछ नहीं चाहिए . एक सेल्फी ले लूं ?” और मोबाइल पर हम दोनों की एक नम आँखों की सेल्फी दर्ज हो गई .

