शब्द मसीहा की लद्युकथा : सलाम भोले नाथ

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…
सुबह से दोपहर तलक वह सीढियों के पास बैठा रहा मस्जिद की , हिलाता रहा अपना कटोरा, मगर पेट की भूख का इंतजाम न हुआ। बड़ा मायूस था ख़ुदा के दर और ख़ुदा के बन्दों से। जामा मस्जिद से उठा और गौरी शंकर मंदिर की तरफ बढ़ गया। अपना कम्बल बिछाया और कटोरा निकालकर हाथ में तस्वी पकड़कर खुदा को याद करने लगा।
जो भी आदमी गुजरता बगल के कटोरे में कुछ डाल आगे बढ़ जाता, मगर उसका कटोरा अभी भी खैरात की राह में पेट की तरह भूखा था।
मंदिर की तरफ हसरत से देखा और अपने बगल में बैठी भिखारिन को देखते हुए बोला- “अम्मा! क्या मेरे माथे पर मुसलमान लिखा है? आखिर इस दर पर भी मेरा कटोरा खाली क्यों है?”
- अरे! बेटा, तेरे माथे पर नहीं, सर पे लिखा है। तूने ये टोपी जो पहन रखी है।“ भिखारिन ने उसके सर से टोपी उतारते हुए कहा।
कुछ देर बाद कुछ सिक्के और एक दस का नोट उसके कटोरे में भी गिरा। वह हैरान था दुनिया की नजर पर, और दिल में गहरे तक घुसी मजहब की दीवार पर, जो लिबास देखकर अपने रहम और दान का चुनाव करती है।
वह जोर से हँसा…फिर भिखारिन के पाँव छुए और बोला- “अम्मा! तू वाकई अम्मा है। दुनिया को तू जनती है, सो सब जानती है….ससुर कपड़ों का भी मजहब होता है…हा हा हा। वाह! मेरे मौला…भूख का मजहब नहीं होता…..शुक्रिया…..सलाम भोले नाथ।“
