कभी दो पैसे में सौ किलो का बोरा ढोते थे, आज 75 की उम्र में भी ठेला चलाते नहीं थकते मुंशी अहमद

( फतेह बहादुर गुप्ता )
रतनपुरा / मऊ । मुंशी अहमद ऐसे श्रमिक हैं, जो 75 वर्ष की आयु में भी ठेला चलाकर मजदूरी करते हैं। मुंशी अहमद रतनपुरा कस्बा के पश्चिमी मोहल्ला निवासी हैं ,और पिछले 55 वर्षों से पल्लेदारी का कार्य कर रहे हैं। मीडिया में कुछ ऐसी खबरें होती हैं, जो लगातार चलती रहती हैं, और वह उन तबकों से होती है जो समाज के उच्च वर्गीय होते हैं। निम्न वर्ग के लोग जो कठोर परिश्रम करके अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं, वह लोग प्रिंट और सोशल मीडिया से दूर रहते हैं। जिन्हें आमजन नहीं देख पाते, समझ नहीं पाते। लेकिन मुंशी अहमद पर अचानक नजर नहीं गई ,बल्कि लंबे अरसे से पूरी ईमानदारी के साथ पल्लेदारी करने वाले इस मेहनत कश मजदूर की लगन शीलता से सभी लोग आश्चर्यचकित हैं।
मुंशी अहमद पुत्र स्वर्गीय सदीक अहमद निरक्षर हैं और उन्होंने शुरुआती दिनों में 5 वर्षों तक राजगीर मिस्त्री का कार्य किया। परंतु उसमें उनका मन नहीं लगा। और 20 वर्ष की उम्र में इन्होंने पल्लेदारी का कार्य शुरू किया। उस दौर में सामू राजभर, अनपत राजभर, रामनाथ राजभर पशुपति राजभर तथा बलेसर राजभर इनके समवर्ती पल्लेदार हुआ करते थे। उन दिनों बलेसर राजभर पढ़े-लिखे पल्लेदार थे। समय से कस्बा में उनकी आमद होती थी ,और सबसे पहले वे अखबार पढ़ते थे ।इसके बाद वे पल्लेदारी की तरफ रुख करते थे। एक तरह से पल्लेदारों के नेता हुआ करते थे बलेसर राजभर। परंतु मुंशी अहमद को इस बात का रंज है कि उनके समवर्ती पल्लेदार सामू ,अनपत ,रामनाथ , पशुपति और बलेसर अब इस दुनिया में नहीं है।
कठोर परिश्रम और अपने गाढ़ी कमाई की बदौलत लगातार कार्य करने वाले मुंशी अहमद को लोग आराम की सलाह दे रहे हैं। परंतु उनका मानना है कि जब तक उनका शरीर साथ दे रहा है ,तब तक वह पल्लेदारी और रिक्शा ट्राली चलाने का कार्य करते रहेंगे। इस उम्र में भी उनको चश्मे की आवश्यकता नहीं पड़ती। उनके दो पुत्र इस्लाम और इसराइल हैं जो शादीशुदा हैं और अपना कार्य बखूबी करते हैं । यद्यपि उनके दोनों पुत्र अलग-अलग रहते हैं परंतु मुंशी अहमद की खोज खबर लेते रहते। उनकी इकलौती पुत्री कुरेशी खातून थी, जिसका शादी के कुछ दिनों बाद ही निधन हो गया। परंतु उसके बच्चे सही सलामत हैं और सऊदी अरब में रह करके कमाते खाते हैं।

बताते हैं कि मुंशी मुहम्मद शरीर से स्वस्थ और इतने मजबूत इंसान थे कि 20 वर्ष की उम्र में वह सिर पर बोरा रख कर के रोडवेज की बस पर चढ़ जाते थे। यह उनका प्रतिदिन का कार्य था। उन दिनों भारी वाहन नहीं चलते थे। बल्कि रतनपुरा कस्बा के गल्ला व्यापारी रोडवेज की बसों पर खाद्यान्न लदवा करके बलिया बेचने ले जाते थे। उस दौर में मुंशी अहमद एक ऐसे पल्लेदार थे, जिसे कस्बा के व्यापारियों की तलाश रहती थी। उस दौर में वही एक ऐसे पल्लेदार थे ,जो सिर पर बोरा रख कर के और रोडवेज की बस पर चढ़ने की कूवत रखते थे। उस दौर में मुंशी अहमद को छोड़कर के कोई भी पल्लेदार बस पर नहीं चढ पाता था। यह वह दौर था जिससे कम पैसे की मजदूरी में भी लोगों के पेट भर जाते थे ,और परिवार का भरण पोषण हो जाता था ।क्योंकि उस समय पल्लेदारी 2 पैसे प्रति बोरा मिलता था, और बोरी का वजन 100 किलो हुआ करता था। बाद में पल्लेदारी पांच पैसे से बढ़कर 10 पैसे, 15 पैसे और नमक का वो बोरा ढोने पर 25 पैसे की पल्लेदारी मिला करती थी। अब जैसे-जैसे पल्लेदारों की शारीरिक क्षमता घटती गई, वैसे वैसे बोरो का वजन भी कम होता गया। अब 100 किलो वजन के बजाय 50 से 70 किलो के वजन के बोरे आ रहे हैं। जिसे पल्लेदार अपनी शारीरिक क्षमता से इसका उठान करते हैं।
मजदूरी करने के उपरांत जब शाम को मुंशी अहमद घर पर जाते हैं और उनके पोते जेब खर्च मांगते हैं ,तो इन्हें बड़ी प्रसन्नता होती है, और वह उन्हें आज भी पैसे देते हैं। इस उम्र में मैं भी पूरी शिद्दत के साथ मजदूरी करने वाले मुंशी अहमद अपने समवर्ती उम्र के लोगों के लिए एक नजीर बने हुए हैं जो आज भी अपने कठोर परिश्रम पर पूरा भरोसा रखते हैं, और पूरी ईमानदारी के साथ अपने कार्य को अंजाम दे रहे हैं। कस्बा वासियों ने उनके जज्बे को सलाम किया है।


