रचनाकार

एक अमानती मोबाइल फोन का क़िस्सा…

( सुशोभित )

ये उस समय की बात है, जब जेबी फोन और ज़मीनी फोन का एक द्वैत समाज में उपस्थित था। जेबी फोन यानी मोबाइल और ज़मीनी फोन यानी लैंडलाइन टेलीफोन। तब मोबाइल फोन नए-नए चलन में आए थे। ये हर किसी के पास नहीं होते थे। टेलीफोन का ज़माना था, लेकिन टेलीफोन भी हर घर में नहीं होते थे। जिनके यहाँ नहीं होते, उन्हें किसी दूरस्थ को कुशल-समाचार देने या उससे बातचीत करने के लिए कॉइन बॉक्स या एसटीडी-पीसीओ का इस्तेमाल करना पड़ता था। जिनके पास टेलीफोन होते, वो उनके घर के ज़रूरी असबाब का एक हिस्सा होते- टीवी, रेडियो और इस्तरी की तरह। ये किसी मेज़ या खिड़की के आले में रखे होते- क़लम, दवात, कंघी, दर्पण, दवाइयों की शीशी के साथ। उनके पास एक छोटी-सी डायरी होती, जिसमें ज़रूरी नम्बर लिखे होते। ख़ुद फोन पर एक स्लाइडनुमा हाशिये में एक पर्ची लगी होती, जिस पर उस फोन का नम्बर लिखा होता।

जब-तब उस फोन की घंटी बजती। कोई एक फोन उठाता, लेकिन किसका फोन आया है और क्या बात हुई है, यह पूरे घर को मालूम होता। निजता की गुंजाइश नहीं थी, और अर्थपूर्ण फुसफुसाहटों से भरी निजी बातों के बिना जीवन ही ना कट सकेगा, वैसी बात भी ना थी। दुनिया अपने आलम में राज़ी-ख़ुशी थी। अलबत्ता अगर कभी फोन दो घंटी देकर चुप हो जाता या फोन उठाने के बाद उधर से कोई आवाज़ नहीं आती, तो सब सशंक हो उठते। दूरदराज़ की बातें सोची जाने लगतीं ये ग़ून्ना या चुप्पा भला कौन हो सकता है, उसके मन में जाने कौन चोर हो सकता है?

साल दो हज़ार अभी शुरू ही हुआ था। जिसके पास मोबाइल फोन होता, उसकी एक शान होती थी। उसकी चाल में घमंड आ जाता। जब वह मोबाइल पर बातें करता तफ़री करता तो यों लगता जैसे कोई मोर लहककर चल रहा है। उससे कहा जाता कि मियाँ आजकल तो मोबाइल मेंटेन कर रहे हो यानी बहुत माल कूट रहे होंगे, गोया कि हाथ में मोबाइल होना अमीरी की निशानी थी।

वैसे में मुझ दीन-हीन-सुदामा के पास मोबाइल भला कहाँ से आता। किंतु एक बार ऐसा हुआ कि मेरे कार्यालय के एक सहकर्मी- जो मोबाइलधारी थे और इस कारण सबकी ईर्ष्या और कौतूहल का केंद्र थे- को किसी काम से बाहर जाना पड़ा। वो अपना मोबाइल अमानत बतौर मेरे पास छोड़ गए। कहा, कल आकर ले लूंगा। अव्वल तो फोन बजेगा नहीं, बजे तो उठाना नहीं क्योंकि फोन मेरे लिए होगा, तुम बात करके क्या करोगे? वो नोकिया का फोन था और 98262 की शृंखला से शुरू होने वाला नम्बर था। मैं राज़ी हो गया।

फोन ले तो लिया, किंतु जैसे ही वो रवाना हुए, दिल में एक धड़कन जाने कहाँ से आन बसी। मन में अंदेशा आ गया। मेरी जेब में एक मोबाइल है, इसकी चेतना कुछ यों नाज़िल हुई, जैसे किसी के घर में धन गड़ा हो तो वो हैरान-सा चौक-बाज़ार में फिरता है कि कोई उसका रहस्य जान ना ले। नाग के पास जैसे मणि होती है, वैसे ही मेरे पास वह मोबाइल था- किसी को उसके बारे में मालूम ना था किंतु बात खुल जाए तो बड़ी विपदा हो रहेगी- यह भय भीतर चला आया। अगर फोन लेकर बाज़ार में निकलूँ तो डकैती-लूट का शिकार तो ना हो जाऊँगा? किसी संगीन वारदात का हिस्सा तो ना बन जाऊँगा कि तुम्हारे पास यह फोन कैसे? किसी तफ़्तीश-कचहरी का सामना तो ना करना पड़ेगा? दो घड़ी बीतते ना बीतते जेब में रखी उस पराई अमानत की चेतना मन को क्लान्त करने लगी, जैसे कि उसने मुझको पारदर्शी बना दिया हो और सबकी नज़रें मुझी पर गड़ गई हों।

सन्ध्यावेला में घूमने निकला तो विचित्र उलझन में पड़ गया। मुझे लगा जैसे सहसा दुनिया छोटी हो गई है, तमाम व्याप्तियाँ सिमटकर रह गई हैं। मोबाइल फोन से पहले वाली दुनिया में जब कोई घर से बाहर निकलता था तो हवा भरे ग़ुब्बारे की तरह आसमान में गुम हो जाता था, उसके लौट आने तक उसका कोई पता-ठिकाना ना मिलता था। अगर उसके लिए कोई ज़रूरी काम आन पड़े तो घर के लोग उन जगहों पर उसे खोजने निकलते थे, जहाँ उसके पाये जाने की गुंजाइश ज़्यादा थी- किसी दोस्त के घर, चौक की दुकान पर, पास-पड़ोस के किसी बगीचे में, चाय की थड़ी पर, सिनेमाघर में। किंतु जेब में मोबाइल होने के कारण सहसा मुझको लगा, जैसे मैं सबकी ज़द में आ गया हूँ। मेरा एकान्त भंग हो गया। मेरी अनन्यता में सेंध लग गई। दुनिया एक दूरबीन बन गई थी और मैं उसकी रेंज में गिरफ़्तार हो चुका था, मैं इससे बचकर कहीं जा नहीं सकता था। किसी भी लमहा फोन की घंटी बज सकती थी और मैं पकड़ा जाता- जैसे कि कोई चोर। झुटपुटा होते ना होते मैं उस फोन से आज़िज़ आ गया, मैं समझ गया कि मैंने इस बला को अपने पास रखकर एक बड़ी मुसीबत मोल ले ली है।

दफ़्तर में काम करने पहुँचा- सहमा और सकुचाया हुआ, जैसे कोई राज़ अपने सीने में दफ़्न किए हूँ, लेकिन जिसको किसी पर ज़ाहिर नहीं किया जा सकता है। काम करने की मेज़ पर बैठा, बेमन से कुछ फ़ाइलें पढ़ीं, कुछ रद्दोबदल किए, कुछ काग़ज़ काले करके आगे बढ़ाए, कि अचानक- जैसे बिजली गिरी हो- फोन की घंटी बज उठी!

सबके कान खड़े हो गए। यह फोन की आवाज़ किधर से आ रही है? भला आज कौन लखपती हमारे दफ़्तर में नमूदार हुआ है। जैसे ही सबका ध्यान ध्वनि के स्रोत की ओर गया तो वो चौंके। अगर किसी एक के पास मोबाइल होने की सम्भावना सबसे कम थी तो वह नामुराद मैं ही था- तब आज मेरे पास फोन की घंटी भला कैसे बज उठी, यह क्या घोटाला है? इधर मुझे काटो तो ख़ून नहीं। जैसे रंगेहाथों पकड़ाया हूँ। उठा, और झेंपकर, जिसमें मोबाइलधारी होने के किंचित गौरव का आरोप भी था- एक एकाकी कोने में गया, और यंत्रवत होकर फोन उठा लिया- इस डर से कि अगर उठाया नहीं तो यह घंटी अनंतकाल तक बजती ही रहेगी और मेरी आत्मा को कभी शांति नहीं मिल सकेगी।

-हाय। उधर से एक युवा स्त्री का स्वर घुंघरू की तरह गूँजा। मुझे लगा जैसे मुसीबत में दो बल पड़ गए। कोढ़ में खाज वाली कहावत याद आई। -जी। काँपती आवाज़ में जवाब दिया। -इतने घबराए क्यों हो- स्त्री-स्वर ने कमनीयता से पूछा। -बस यों ही- मैंने जवाब दिया- फिर नासमझी से पूछ बैठा, -लेकिन आप? उधर से फ़ौरन जवाब दिया, -पहचाना नहीं, अजी आपके चाहने वाले हैं। मैंने कहा, -माफ़ कीजिये, वो बात यह है कि सर यह फोन मेरे पास छोड़ गए हैं, वो कहीं बाहर गए हैं। अब वो चौंकीं। थोड़े रूखेपन से कहा- तुम संजीव नहीं हो? मैंने कहा- नहीं। उन्होंने कहा- अजीब अहमक़ हो, तुम्हें इतनी भी तमीज़ नहीं कि किसी और का फोन नहीं उठाते। मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। अपराधी के जैसा लाल चेहरा लिए खड़ा रहा। एक ऐंठन भरी क़िस्म की ख़ामोशी खिंच गई, जिसके बाबत आप हमेशा यह ख़्वाहिश रखते हैं कि काश यह इतनी खिंचे कि टूट जावे। और वह टूट गई। फोन कट गया। मैंने मोबाइल को फिर से जेब में रख लिया। लज्जा से म्लान और हीनभावना से भरा हुआ। ज़ाहिर है, इस शैतानी बला को अपने पास रखने पर कोई भली बात तो हो ही नहीं सकती थी।

अगले दिन वो साहब लौटे, मैंने उन्हें उनकी अमानत सौंपी। साँझ को वो दफ़्तर आए तो नाराज़ थे। मुझे बुलाया। मैं समझ गया कि उन तक कल वाली पूरी कहानी पहुँच चुकी है। वो कुछ कहते, उसके पहले ही अपनी सफ़ाई में कह बैठा- माफ़ कीजिये, मैं हड़बड़ा गया था, मुझे आपका फोन नहीं उठाना चाहिए था, वो आपका ज़ाती मामला ठहरा। उन्होंने कहा- ज़ाती मामले की ऐसी की तैसी, इनकमिंग का चार्ज लगता है, पूरे दो मिनट पचीस सेकंड तुम्हारी बात हुई, मेरा बैलेंस ज़ीरो हो गया है!

ईश्वर ऐसा ज़ीरो बैलेंस किसी दुश्मन को भी ना दे- तब मन ही मन यह दुआ करता उस रात घर लौटा और चैन की नींद सोया, जैसे जेल से छूटा हूँ। सोने से पहले हीरामन की तरह क़सम खाई- ज़िंदगी में भले हज़ार गुनाह कर लूँ, लेकिन मोबाइल फोन लेने का गुनाह कभी नहीं करूँगा!

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