भारत बैठा सोच रहा, क्या मेरे भी अच्छे दिन आयेंगे…

( डॉ. सरला सिंह “स्निग्धा” )
भारत बैठा सोच रहा ,
क्या मेरे भी अच्छे दिन आयेंगे ।
कब होगा जब मेरे बच्चे ,
भूखे पेट ना सोयेंगे ।
सबके सिर पर छत होगी ,
फुटपाथ पर ना कोई सोयेगा ।
सब समान होंगे धरती पर,
छोटा ना बड़ा कहलायेंगे ।
भारत बैठा सोच रहा ,
क्या मेरे भी अच्छे दिन आयेंगे ।
शिक्षा में समान अवसर सबको,
कोई भी बच्चा ना वंचित होगा ।
प्रतिभा ना पलायित कब होगी,
उत्कर्ष बनेगा चरमोत्कर्ष ।
ना व्यापार बनेगी शिक्षा कब,
सबको शिक्षा मिल पायेगी ।
भारत बैठा सोच रहा ,
क्या मेरे भी अच्छे दिन आयेंगे ।
कब नारी नर के सम होगी ,
अधिकारों से ना वंचित होगी ।
स्वाभिमान सम्पूरित होगी ,
ना किसी भी रुप में दलित होगी ।
नारी समाज में उच्च मान ,
फिर उच्चतम मान पा पायेगी ।
भारत बैठा सोच रहा ,
क्या मेरे भी अच्छे दिन आयेंगे ।
कब सारे किसान होंगे खुश हाल ,
ना होगा कष्ट किसी को कभी ।
सबके हित होगा अवसर समान ।
ना निज को कोई मारेगा ।
सम्पन्न सभी हो जायेंगे ,
ना होगा बेकल बेबस कोई ।
भारत बैठा सोच रहा। ,
क्या मेरे भी अच्छे दिन आयेंगे ।
डॉ. सरला सिंह “स्निग्धा”
दिल्ली।

