समाजवादी उम्मीद 2022…
( डा. अम्बरीष राय )

आज की तारीख़ में उत्तर प्रदेश को देखता हूं तो बीते पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं. कभी 2011 का अवसान मुस्कुराता है तो कभी 2006 की ढ़लान अपने हश्र पर रोती है. महावत बावफ़ा नहीं रहा, हाथी सर्कस से उबकर जंगल चला गया. सवार आपस में क्या लड़े, साइकिल पंक्चर हो गई. कीचड़ हो गई ज़मीन पर कमल खिलखिलाने लगा. तालाब से बदबू आने लगी है, कमल मुरझाने लगा है. दिल्ली हांफ रही है तो लखनऊ की जान आफ़त में है. लाशें अपने इंतिज़ाम पे रोती ठिकाने लग गई हैं. कोरोना अपनी ख़ुराक निपटाने के बाद अपनी गुफा में डकार ले रहा है. बची खुची ज़िंदगियां अपने को सम्हालने में हैं तो कुछ नया इंतिज़ाम बनाने में.
राजनीति में फिर ब्याह का मौसम है. रिश्तेदारों के रूठने और मिलने का मौसम है. दूल्हा बेक़रार है तो दुल्हन बेसब्र. बाराती गाड़ियों के चक्कर में हैं तो मैनेजर गाड़ियों के इंतिज़ाम में. कांग्रेस इस बार फिर रस्मी तो है लेकिन अगले सावन में फिर अपने यौवन की दुकानों के लिए जगह दुरुस्त कर रही है. सबसे आगे रहने वाला हाथी फिर से वहीं पहुंच गया है, जहां उसको खाने के लिए किसी और की दहलीज़ पर माथा टेकना पड़ता था. पेट्रोल डीजल इतना महंगा हो चुका है कि लोग फिर से साइकिल की सवारी करना चाहते हैं. साइकिल पूंजी का प्रतीक नहीं बल्कि समाजवाद का मज़बूत उदाहरण है. लेकिन अफ़सोस साइकिल समाजवादी सल्तनत का हिस्सा हो गई है. और इस हिस्से में नव स्थापित राजघराना और उसके षड़यंत्र हैं. अपने दुःख अपनी तकलीफ़ें, अपना ऐश्वर्य है. किले तक सिमट आई इस सल्तनत को देखें तो औरंगजेब से लेकर बहादुरशाह ज़फ़र की कहानियां मौजू हो जाती हैं. औरंगज़ेब एक क़ामयाब शासक था तो बहादुरशाह ज़फर एक विशाल साम्राज्य का ढहता प्रतीक. इतिहास फिर उसी दोराहे पर है तो लोकतंत्र के मुखौटे में राजतंत्र फिर अपनी अपनी चालों में व्यस्त.
दिल्ली वाले चक्रवर्ती सम्राट का घोड़ा उत्तर प्रदेश में फंस गया है. वो लगातार अपने सिपहसालारों के साथ घोड़े को बचाने की तरकीबें सोच रहा है. सूबेदार बदमिज़ाज़ तो है लेकिन बदगुमान नहीं. लिहाज़ा शहंशाह का हुक़्म बजाए जा रहा है, बावजूद इसके कि उसके कुछ सिरफ़िरे समर्थक मूर्खताओं की बी सी ग्रेड की फिल्मों के सस्ते कथानक गीता क़ुरआन की तरह बांच रहे हैं. सुना रहे हैं. हास्यास्पद दिख रहे हैं. लेकिन ठीक इसी वक्त समाजवाद के राजघराने में पैदा कुंवर अपनी चालों को सम्हाल नही पा रहा है. औरंगजेब की हरक़तों से बहादुरशाह ज़फ़र के हश्र तक पहुंच चुके भईया जी अपनी जवानी कुर्बान गैंग के ‘ जय अखिलेश’ के नारों के शोर में फिर 2016 के आख़िरी सियासी कैनवास पर पेंटिंग करने लगे हैं. एक बात साफ़ कहूं तो दरअसल वो पेंटर बहुत ख़राब हैं. समाजवादी सल्तनत की बची खुची उम्मीदों को चाटने में लगी जमात कभी उन्हें राजा रवि वर्मा जैसा अभूतपूर्व चित्रकार का एहसास दिलाती है तो कभी एम एफ हुसैन बना देती है.
मुलायम सिंह के चेहरे पर लड़े गए आख़िरी सूबाई चुनाव में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बन गए. उत्तर प्रदेश का समाजवादी स्तम्भ बूढ़ा होने लगा था. परिवार बड़ा था, तो जीते जी उत्तराधिकार तय कर दिया. बेटा मुख्यमंत्री था तो आसपास के लोग महत्वपूर्ण. समाजवादी साम्राज्य के सिंहासन पर बैठे अखिलेश को गांधी की धरती से आए एक क्षत्रप से लड़ना पड़ा. गुजराती क्षत्रप राष्ट्रवादी था. और निर्विवाद रूप से अपने घराने का नेता. 2014 की जंग में कितने क्षत्रप ढ़ह गए, कितने दिग्गजों का सियासी क़त्ल हुआ. कैसे दिल्ली तख़्त पर बैठा एक राजघराना दक्षिणपंथियों के हाथों दक्खिन हो गया, लोग देखते रह गए. बूढ़े राजा और अपने पिता को दिल्ली में बिठाने की हसरत पाले समाजवाद की नई सनसनी को पांच सीटों पर सिमटना पड़ गया. मुख्यमंत्री बने दो ही साल हुए थे. कहा जाता था कि साढ़े तीन मुख्यमंत्री हैं. नया नेतृत्व पनप ही नहीं पा रहा है. तीन साल और गुज़रे.
नेतृत्व पनपने की तो छोड़िए, वो विशाल वटवृक्ष हो गया. वटवृक्ष के सामने तो कोई चुनौती होती नहीं. अंहकार ने, ग़लतफ़हमियों ने, झूठी ख़बरों ने चाचा शिवपाल यादव को किनारे लगा दिया. नए समाजवादी राजा ने सब कुछ अपने मन किया और हासिल 2017 में फिर एक शर्मनाक हार रही. लोगों ने अंहकारी राजा को हटाया या फिर एक बदमिज़ाज़ भतीजे को, इसको लेकर विमर्श के कई सत्र आयोजित होंगे लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाएं, ये तक़रीबन नामुमकिन है. आहत अपमानित चाचा ने नया डंडा नया झंडा बनाया और औपचारिक रूप से अपने रास्ते अलग कर लिए. फिर आया 2019. पदच्युत समाजवादी राजा ने अपने दिमाग़ से आख़िरी चाल चली. सपत्नीक दलित देवी मायावती के चरणों में समर्पित हो गए. जवानी कुर्बान गैंग ने फिर ‘जय अखिलेश’ का गगनचुंबी उद्घोष किया. दिल्ली के सुल्तान की विदाई के गीत गाये जाने लगे. नरेंद्र मोदी की भाजपा को दस पांच सीटों से ज़्यादा देने को कोई समाजवादी समर्थक राजी नहीं था. लेकिन एक दिन परिणाम आया. समाजवादी उम्मीद ने अपनी पत्नी की हार देखी. भाइयों की हार देखी. हासिल फिर वही पांच सीटें. लेकिन घर के तीन लोग भी हार गए.
लगातार तीन अपमानजनक हार के साथ अखिलेश यादव अभी भी विरोधियों से मुक़ाबिल दिखते हैं. पंचायत चुनावों से समाजवाद की बांछे खिली हुई हैं. योगी आदित्यनाथ की सरकार से आहत लोगों ने मन बना लिया है. मन बना लिया है कि भगवाधारी से मुक्ति मिले.6 महीने बाद चुनाव हैं. लेकिन समाजवादी शासन स्थापित होने में फिर वही पेंच है. ये कॉलेज का चुनाव नहीं है. और ना ही गांव विशेष की परधानी. ये उत्तरप्रदेश का रण है. जिसे जीतने के लिए समाजवाद को अपना अंहकार छोड़ना होगा. सही मायनों में समाजवादी होने का एहसास दिलाना होगा. आहत चाचा को मान देना होगा. अपमानित चाचा भले न अपने जीत पाएं, लेकिन सैफई के इस राजघराने की इस उम्मीद को ज़रूर लील जाएंगे. शिव पालक भी होते हैं. शिव संहारक भी होते हैं. जो शिव को साध लिया, उसका कल्याण हो गया. उत्तरप्रदेश का शरीर ही नहीं, आत्मा भी छलनी है. अगर साथ साथ रहे समाजवादियों! तो सेवा का अवसर मिल सकता है वरना दाढ़ी मूंछ मुड़ाए।
लेखक अम्बरीष राय दिल्ली में वरिष्ठ सम्पादक हैं।

