क्या मोबाइल फोन की आदत मानव जीवन के लिए वरदान है या अभिशाप….?
( डॉ मीना कुमारी परिहार )
“ज़िन्दगी गुजरने लगी है अब तो किश्तों पर,
ये कुछ ग्राम का मोबाइल भारी पड़ गया है रिश्तों पर”
“जबसे लोग मोबाइल के इतने करीब हो गये,
एक दूसरे को समय देने में उतने ही गरीब हो गये”
जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही मोबाइल फोन के लाभ तथा हानि दोनों हैं और यह हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
मोबाइल फ़ोन हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता हैतथा इसका आविष्कार यंत्रों की दुनियां में क्रान्ति लेकर आया है।आज के समय में हमारे बहुत सारे काम मोबाइल की सहायता से घर बैठे ही कुछ मिनट में हो जाते हैं। पर मोबाइल के इतना अधिक उपयोग ने हमें उसका आदी बना दिया है। जिसके वजह से हम एक पल के लिए भी अपने मोबाइल को खुद से दूर नहीं रखना चाहते हैं।यह हमारे जीवन पर अनुचित प्रभाव डालता है।
मोबाइल की आदत ने मानव को अपने अधीन कर लिया है। गैजेट हमारे उपयोग के लिए है पर यहां गैजेट्स हमारा उपयोग कर रहे हैं। व्यक्ति को मोबाइल की ऐसी आदत है कि वह पास बैठे लोगों से बात करने के स्थान पर सोशल मीडिया पर मित्रों से लगा रहता है। इससे उसके अपनों से आपसी सम्बन्ध कमजोर होते चले जाते हैं। साथ ही मानव के जीवन की विभिन्न पहलुओं को भी यह आदत प्रभावित करता है, जैसे स्वास्थ्य, कैरियर , अध्ययन आदि।
मोबाइल की आदत से होनेवाली बीमारी को ‘नीमोफोबिया’कहते हैं।’
‘अपनों से जोड़ना’कहां मोबाइल की परिभाषा के रूप में पढ़ा जाता था।आज अपनों से दूरी का मुख्य कारण मोबाइल है। व्यक्ति एक कमरे में एक साथ होने के बाद भी पास बैठे लोगों में अपनी कोई रुचि नहीं दिखाता और अपने-अपने मोबाइल के स्क्रीन स्क्रोल करता रहता है। इससे आपसी संबंध कमजोर होते हैं।
बेशक टेक्नोलॉजी के माध्यम से हम विकास की ओर बढ़ पाते हैं, जिसमें मोबाइल फोन मुख्य भूमिका निभाता है। क्योंकि यह सबके पास पढ़ाई के लिए लैपटॉप या कम्प्यूटर नहीं हो सकता पर मोबाइल होता है। जिसकी मदद से वह अपने संदेह दूर कर सकते हैं पर मोबाइल की आदत आज लोगों को घंटों अपना कीमती समय मोबाइल को दे देते हैं। जिससे उनका ध्यान पढ़ाई पर नहीं लगता है।अपने व्यवसाय में अपना पूर्ण योगदान नहीं दे पाते हैं।
हम सभी को इस बात का ध्यान रखना होगा कि मोबाइल फ़ोन हमारे लिए वरदान है तो वहीं अभिशाप भी है।
“मोबाइल को इक पल ना देखूं
तो चैन आता नहीं,
मोबाइल के सिवा कोई और भाता नहीं है”
“किताबों को सदा के लिए कैद कर दी आलमारी में,
ज़िन्दगी उलझी पड़ी है मोबाइल और कम्प्यूटर की मारा-मारी में”।

