रचनाकार

‘बलमाजी का स्टूडियो’ एवं ‘तीन लहरें’ कहानी संग्रह के बाद मऊ की बेटी डा. सोनी पाण्डेय का उपन्यास “सुनो कबीर”

■ पूर्वांचल की साझी सांस्कृतिक विरासत पर केन्द्रित पहला उपान्यास

( संजय श्रीवास्तव )

‘सुनो कबीर’ सोनी पाण्डेय का उपन्यास है। शुरू होते ही यह उपन्यास कथारस से नहला देता है। खिलंदड़पन से विभोर करने वाले माहौल में पाठक रम जाता है। पढ़िए और पढ़ते जाइए। पाठ की अन्वितियां भी बनी रहती हैं। कहानी का पूरबिया बास आंचलिक वितान से घिरा हुआ है। पढ़ते हुए खास तरह की रसानुभूति हमें हास और त्रास में बेध देती है। लोकमन की दुनिया में बदलते समाज की झलक भी है। बाइसवीं सदी में खड़े किसी पिछले दौर का कोई नैरेटर जैसे अपनी बात रख रहा हो, यह लगातार ध्वनित होता है। इसकी अनुभूति से गुजरना पाठक के लिए रोचक होगा।

डा. सोनी पाण्डेय

हमारे देश में स्थानीयता की सदियों पुरानी सामाजिक संरचना के तंतुवाय जिस तरह क्षरित हो रहे हैं, उसी का एक वृत्तांत है यह उपन्यास – ‘सुनो कबीर’। वर्तमान व्यवस्था में राज्य और राजनीति की कोख से पैदा जार्ज विचारधारा ने मानवीय संवेदनाओं का दमन किया है, उसके अनेक दृश्य इस उपन्यास में हैं। बकौल सोनी पाण्डेय – ‘गाँव इब्राहिम पुर हिन्दू- मुस्लिम साझी आबादी वाला गाँव है और हर साल चढ़ते कुवार यहाँ दोनों कौम मिलकर रामलीला खेलते और खूब जोश और उल्लास से दशहरा मनाते हैं। इस गाँव में एक संगीत प्रेमी परिवार पता नहीं कबसे रहता चला आ रहा है जो रामलीला ,नौटंकी ,भजन किर्तन में साज बजाता।…मूलतः यह लोग शहीद बाबा की मजार पर हर वृहस्पतिवार को कौवाली गाते।’
यही नहीं, वे इस पर और रोशनी डालते हुए लिखती हैं, ‘भारत के तमाम संघर्षरत किसानों -मजदूरों की व्यथा कथा यहाँ भी व्याप्त है ।यह गाँव मूलतः बुनकरों की  सघन आबादी वाला गाँव है जहाँ बिना किसी जातिगत बँटवारे के एक तिहाई घरों में करघों का नाद सौन्दर्य व्याप्त है।चम्पा की उलझी तानी सलमा सुलझा जाती  है तो सलमा को सुन्दर बेल – बूटे बनाना चम्पा सिखा जाती है ।यहाँ लड़कियों के झुण्ड एक साथ कन्या पाठशाला से लेकर स्कूल कालेज जाता रहा है । यहाँ सब कुछ सामान्य है….लड़के- लड़कियाँ एक दूसरे से प्रेम करते हैं, मोबाईल पर संदेश भेजते हैं, छोटी बहनों से प्रेमिकाओं को उपहार भेजते हैं और इस एवज में छोटी बहनें भाईयों को इमोशनल ब्लैकमेल कर ,पैसे ऐंठ अपनी जरूरतें पूरी करतीं हैं। यह प्रेम अँखुवाता है,जवान होता है पर परवान नहीं चढ़ता,कारण बड़े बुजुर्ग हर हाल में मामला सम्हाल लेते हैं और इस तरह प्रेम के नाम पर मार -काट की घटना का यहाँ कोई इतिहास नहीं है।’

मास्टर उस्मान की चिंता में बर्बाद होते लोग विकास के प्रपंच में कैसे बहकाए जा रहे हैं – इस वर्णन को देखना मानीखेज़ है। विकास के इस संदर्भ को बेहद गंभीर तरीके से इस उपन्यास में हमारे रखा गया है। बस इसी उद्धरण से जायजा लिया जा सकता है।

  • ‘दुनिया इधर तेजी से बदल रही है…. लखनऊ से चली सिक्स लेंथ सड़क आज़मगढ की सरहद तोड गाँवों के बीच तो कभी कस्बों के बाजार ढ़हाती…खेत खलिहानों को रौंदती इनके गाँव इब्राहिम पूर को पूरे साल (सन् 2019 ) धूल और गर्द से भरे है। सबके फेफडे गर्द से फूल रहे हैं पर खुश हैं कि विकास आया है….खेतों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैंं।शहर के व्यापारी बिघे के बिघे खेत खरीद बांउड्री उठवा रहे हैं। जिधर सड़क निकल रही है उधर के खेतों के दाम आसमान छू रहे हैं।उसमान मास्टर को छोड सब खुश हैं कि अब उनका गाँव टाउन एरिया हो जाएगा। बाजार नजदीक होगा और लड़को को दुकान धन्धे में लगाना आसान हो जाएगा। मास्टर सुनते तमतमा जाते….

मियाँ! जो खेत गये तो खाओगे क्या? मत भूलो की ये सड़क तुम्हें रोटी देने नहीं तुमसे रोटी छीनने आ रही है।

मास्टर इधर जो बयार बही है उससे खासे नाराज हैं….आधी रात को उठ कर टहलने लगते हैं…..बरगद के नीचे शहीद बाबा के मजार से जाकर बतियाने लगते हैं।इधर गाँव भर में शौचालय बन गये हैं पर घूमनी औरतें भी कम जिद्दी नहीं हैं।शुकउवा के उगते खेतों की ओर निकल जाती हैं…आए दिन मास्टर को मजार से बतियाते देख डरने लगी हैं।’

निश्चित रूप से इस उपन्यास ‘सुनो कबीर!’ का कैनवास काफी विस्तृत है। इसके अलावा भारतीय समाज में सह अस्तित्व के पारंपरिक रूप का आख्यान पूरे संश्लेषण में पाठकों को दिखाई देता है। उल्लेखनीय है कि हिंदी कथा-साहित्य से मुसलमान लगातार गायब होता गया है। यह बात एक बड़े महत्वपूर्ण सवाल के रूप में हमारे सामने उठती रहती है। इधर जिस तरह से सामुदायिक घृणा के बलबले हर गली चौराहे पर उठते हैं,वह हमारे समाज के लिए सनसनी के साथ सभ्यता पर किसी हमले के रूप में सामने आता है। सोनी पाण्डेय ने इसका बखूबी खुलासा ‘सुनो कबीर!’ में किया है। उन्हेंं पढ़ते हुए अपना देशराग और उसमें सींझता, अकुलाता, बल खाता, मस्ती में रहने के बावजूद खुराफात से दो-चार होता गांव-गिरांव का खांटी माहौल दिखता है तो साथ ही इसके समानांतर पीड़ा और अवसाद में गहरे डूबी निराश मनोदशाएं भी सामने आती हैं।

सोनी पाण्डेय सुपरिचित कथाकार और कवि हैं। उन्हें निरंतर पढ़ रहे हैं। कहानी और कविता में उनकी दखल बहुत असरदार रही है।’बलमाजी का स्टूडियो’ एवं ‘तीन लहरें’ उनकी कहानियों का बहुप्रशंसित संग्रह पहले से ही हमारे सामने है। सोनी का लेखन विपुल और विविध है। वे ‘गाथान्तर’ पत्रिका का संपादन भी करती हैं। डा.सोनी पाण्डेय आजमगढ़ में रहती हैं जहां वे कस्तूरबा स्कूल की शिक्षिका हैं। वे बेहद संवेदनशील और विचार-समृद्ध एक्टिविस्ट रचनाकार हैं। अब इस उपन्यास के साथ उनकी आमद पहले से और ज्यादा आश्वस्तकारी है। हमारी शुभकामनाएं सोनी पाण्डेयजी!

इस पुस्तक के आलोचक “संजय श्रीवास्तव” डिग्री कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर प्रोफेसर हैं और वाराणसी में रहते हैं। इन्होंने पुस्तक सुनो कबीर के बारे में संक्षेप में जो रूपरेखा प्रस्तुत किया है वास्तव में उन्होंने डा. सोनी पांडेय के एक-शब्द को चुनकर अपने शब्दों में गूंथ कर माला बना दिया है।

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