रचनाकार

एक बार तो बेटी बनकर देखो पुरुष साथियों! आँसू छलक जाएँगे।

( पायल विजय परदेशी )

एक बार तो बेटी बनकर देखों
एक बार तो बेटी बनकर देखो पुरुष साथियों!
आँसू छलक जाएँगे।

क्यों होते हैं ?दुष्कर्म
क्या पीड़ा होती है?
क्यों दर्द उठता है?
क्यों आँखें रोती है?
एक बार तो पीड़ा सहकर देखो! पुरुष साथियों! आँसू छलक जाएँगे।

जब कोई फेंकेगा पूरे चेहरे पर तेजाब
जल जलकर रोओगे, हो जाओगे बेबाक
एक बार जलकर तुम भी देखो! पुरुषसाथियों! आँसू छलक जाएँगे।

जब कोई चढाएगा दहेज की बली
जहर भी पीना होगा चढ़ना होगा फॉसी
एक बार सहम कर तुम भी देखो! पुरुष साथियों! आँसू छलक जाएँगे।

जब कोई जलाएगा तुमको भी एक दिन
अरमानों की नगरी में हो जाओगे छिन्न-भिन्न
एक बार तड़पकर तुम भी देखो!पुरुष साथियों!आँसू छलक जाएँगे।

जब कोई छेड़ेगा और तुमको घुरेगा “पायल” कहती हरदम अब तेरा क्या होगा?
एक बार शर्म से मर कर देखो!पुरुष साथियों! आँसू छलक जाएँगे।

एक बार तो बेटी बनकर देखो! पुरुष साथियों! आँसू छलक जाएँगे।


लेखिका
पायल विजय परदेशी
शिक्षिका एवं समाजसेविका
डॉ अम्बेडकर नगर,महू
जिला इंदौर mob. No. 9826980520
की रहने वाली हैं।

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