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टीबी मुक्त भारत को लेकर स्वास्थ्य विभाग सजग, दस्तक अभियान में पहली बार खोजे जा रहे टीबी मरीज

■ पोषण आहार के लिये मरीजों को इलाज के दौरान मिल रहे 500 रुपये प्रति माह
■ टीबी ग्रसित बच्चों को गोद लेने की पहल फायदेमंद  
मऊ। जनपद में संचालित विशेष संचारी रोग नियंत्रण माह के अंतर्गत दस्तक अभियान में टीबी के मरीजों को खोजने के लिए घर-घर जाकर स्क्रीनिंग की जा रही है जिसमें टीबी के मिलते जुलते लक्षण मिलने पर बलगम की जाँच कराई जा रही है। यह अभियान 31 मार्च तक चलाया जाएगा। वहीं दूसरी ओर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के प्रेरणा से जिले में अधिकारियों द्वारा टीबी ग्रसित बच्चों को गोद लेने और उनका फालोअप लेने व पोषक आहार प्रदान करने की योजना का बहुत फायदा मिला है ।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ सतीश चन्द्र सिंह ने बताया कि जिले में क्षय रोग के मरीजों की सुविधा के लिए उनके निवास के नजदीक ही डॉट्स केंद्र बनाये गए हैं | जिला अस्पताल में स्थापित ड्रग रेजीस्टेंट (डीआर) टीबी सेन्टर में भर्ती कर इलाज की भी सुविधा है | उनके बलगम की जांच के लिए बीएचयू भेजा जाता है। इसके साथ ही टीबी की सभी प्रकार की जांच एवं इलाज मुफ्त में उपलब्ध कराई जाती हैं। जिले के सभी सरकारी एवं स्वैच्छिक संगठनों के चिकित्सालयों में टीबी की जांच व इलाज की सुविधा पूरी तरह से निःशुल्क उपलब्ध करायी जा रही है।
सीएमओ ने बताया कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में 963 क्षय के रोगी मिले, 52 टीबी से ग्रसित लोगों को गोद लिया गया। 01 अप्रैल 2018 से चल रहे निक्षय पोषण योजना के तहत टीबी रोगियों को इलाज के दौरान आधार लिंक खाते में 500 रु हर माह पौष्टिक आहार के लिए दिये जाते हैं। उन्होने बताया कि पूरे विश्व के 27% टीबी रोगी भारत में और भारत में सबसे अधिक टीबी से ग्रसित लोग उत्तर प्रदेश में हैं। भारत सरकार द्वारा वर्ष 2025 तक देश को टीबी से मुक्त करने का संकल्प  लिया गया है।
जिला क्षय अधिकारी डॉ एसपी अग्रवाल ने बताया कि टीबी एक संक्रामक रोग है जो आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करता है। फेफड़ों के अलावा नाखून एवं बाल को छोड़कर शरीर के किसी भी भाग में टीबी हो सकती है। अन्य रोगों के मुकाबले टीबी दुनिया भर में दूसरा सबसे बड़ा जानलेवा रोग है।
डॉ एसपी अग्रवाल ने बताया कि प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन के द्वारा चलाई गई टीबी के मरीजों को गोद लेने की योजना का बहुत फायदा मिला है । इस पहल में जिले के आला अधिकारियों को रेंडम तरीके से क्षय के रोगियों की सूची से गोद लिया गया, जिसके कारण इसके रोगियों को आत्म बल मिला समय-समय पर मोबाईल द्वारा और उनके घर पहुँच कर उनसे मिल बैठ बात करने और फालो-अप लेते रहने के कारण उनके रोगी में अपेक्षा से ज्यादा तेजी सुधार हुआ।
उन्होंने एक वाकया भी साझा किया कि गोद लेने की प्रक्रिया के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी ज्ञान प्रकाश त्रिपाठी टीबी के मरीज पिंकी के पते पर पहुंचे, उन्होंने देखा कि उसके पास रहने के लिये अपना घर नहीं और उसकी माँ की मृत्यु हो चुकी है। उसकी कहानी जानने के बाद डीएम ने उसके पिता को रहने के लिये कांशीराम आवास दिलवाया साथ में उसका फलोअप लेते रहे आज वह पूरी तरह से स्वस्थ जीवन जी रही है।
डीएम मऊ द्वारा गोद ली गई लाभार्थी पिंकी चौरसिया (19) ने बताया कि एक दिन उनके घर कोई बड़े साहब आये थे, उन्होंने उनकी हालत देखा, माँ मर चुकी है । पिता ही संभालते हैं, परिवार की स्थिति ठीक नहीं थी, उसके पिता जो कमाते हैं वह उसके इलाज और घर के किराये में चला जाता था। किसी तरह से गुजर बसर हो रहा था । उनके पास रहने के लिये घर नहीं था तो साहब ने उन्हें आवास दिया । साथ में दवाईयों के साथ पोषक तत्व से युक्त सामान भी उपलब्ध कराये गये खाते में रूपये भी मिले है।

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