दर्द की बारात लेकर क्या करूं
(भास्कर राय)
प्यार की सौगात लेकर क्या करूं,
गम के ये लम्हात लेकर क्या करू
आंख बोझिल है, नहीं हैं ख्वाब इनमें,
एक तनहा रात लेकर क्या करूं।
चाहकर मंजिल कभी जो पा सके ना।
वो हंसी जज्बात लेकर क्या करूं,
बेरुखी है, हर तरफ बेचारगी है,
दर्द की बारात लेकर क्या करूं।
बुझ न पाएगी कभी अब तिस्नगी ये,
बारहा बरसात लेकर क्या करूं।
( लेखक श्री भास्कर राय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

