खास-मेहमान

दो पैरों पर खड़े हुए चौपाये

(शब्द मसीहा केदारनाथ)

मैं अपने कमरे में बैठा हुआ कुछ लिखने में व्यस्त था कि तभी मेरे कान के पास एक मच्छर भिनभिनाने लगा। मेरा हाथ उस मच्छर की तरफ बढ़ा ही था कि मेरे कान में आवाज आई, “अबे रुक! बच्चे की जान लेगा क्या?”
मैंने पहले तो सोचा कि कहीं और से आवाज आई होगी, भला मच्छर भी कभी बोलता है क्या? लेकिन साहब, यह तो कलयुग है, और कलयुग में कुछ भी संभव है। फिर भी अपने आप को आश्वस्त करने के लिए मैंने अपने राइटिंग पैड को एक तरफ रखा और इधर-उधर देखने लगा। लेकिन मुझे कुछ भी ऐसा दिखाई नहीं दिया जहाँ से यह आवाज आई हो। वैसे भी मैं ठहरा शाकाहारी और अहिंसावादी, मैं किसी को नुकसान तो पहुंचाता नहीं हूँ, सो मुझे रुकने के लिए कहेगा भी कौन?
मैंने अपनी टेबल पर रखे हुए गिलास से थोड़ा सा पानी पिया और उस गिलास को फिर से ढँककर रख दिया ताकि दोबारा प्यास लगने पर मैं पानी पी सकूं। मैंने जैसे ही अपना राइटिंग पैड उठाया, तो देखा कि एक मच्छर बैठा हुआ है।
“अब तो पक्का हो गया न कि मेरी ही आवाज थी। साले! तुम लोग तरक्की कर सकते हो, तो क्या तरक्की करने में हम मच्छरों की माँ मरती है?” मच्छर अपनी आगे की दो टांगे हिलाते हुए जैसे मुझसे ही कह रहा था।
“अरे! क्या तुम मुझसे बातें कर रहे हो?” मैंने हैरानी से कहा।
“मैं तुमसे बात नहीं कर रहा हूँ तो क्या कोई एलियन बोल रहा है। जरा-सा कद बड़ा क्या हो गया, अपने आप को तुर्रम खान समझ रहा है।” मच्छर ने मेरी औकात मुझे बताते हुए कहा।
“अरे! एक मच्छर होकर इतनी अकड़, यह तुम्हें शोभा नहीं देता। भाषा में हमेशा सभ्यता और मर्यादा का प्रयोग रहना चाहिए।” मैंने कहा।
“काहे की सभ्यता बे? तुम जो अभी मुझे मारने पर तुले हुए थे, डरे हुए प्राणी। मैं ऐसे डरपोक आदमी के साथ सभ्यता से पेश आऊँ? ऐसी बेवकूफी कोई इंसान ही कर सकता है, हम मच्छर ऐसा नहीं करते।” मच्छर फुदक कर मेरे पैन के ऊपर बैठ गया था।
“हम लोग मच्छरों के कारण बहुत परेशान रहते हैं, इसलिए अगर मच्छर हमारे कान के पास भिनभिनाता है, तो हमारा दिमाग ऑटोमेटिकली हमारे हाथों को आदेश दे देता है। यह एक स्वतः स्फूर्त शरीर की रक्षा की प्रणाली है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।” मैंने कहा।
“वाह, तुम सब लोग ऐसे ही हो। तुम्हारे बड़े-बड़े नेता लोग भी ऐसा ही कहते हैं, लेकिन मुझ गरीब की तो जान चली जाती न। और तुम लोग यह धर्म के लबादे जो ओढ़े रहते हो, वह सब मेरे सामने नंगे हो चुके हैं। मनुष्य सदा से हिंसक रहा है। और अपनी हिंसा को उसने अलग-अलग तरीकों से सही ठहराने का ही काम किया है, जबकि उसकी यह हरकत हमेशा उसके लिए खतरनाक साबित हुई है। मैंने इतिहास को पढ़ा है।” मच्छर इतराते हुए बोला।
मच्छर की बात सुनकर मुझे बड़े जोर की हँसी आई कि साला एक मच्छर इतिहास भी पढ़कर आया है, और वह भी आदमी का। मैंने तो अभी तक लोगों को फिल्मों के डायलॉग पर तालियां बजाते हुए और मच्छरों को मारते हुए देखा है। जब भी नाना पाटेकर इस डायलॉग को बोलता था कि एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है, तब सभी लोग हाल में तालियां पीटते थे, और बेचारे कई सारे मच्छर इसी दौरान शहादत पा जाते थे। मच्छर की ही उम्र कितनी होती है, छह या सात दिन की जिंदगी होती है। और यह साला दावा कर रहा है कि आदमी का इतिहास पढ़ रखा है।
“अच्छा तो मच्छर महाराज! आप अपने आगमन का कोई कारण बता सकते हैं?” मैंने मच्छर को देखते हुए पूछा।
“मैं यहाँ अपनी खुशी से नहीं आता हूँ। तुम लोग मुझे बुलाते हो, और जब मैं आता हूँ तब तुम लोग मुझे दोष देते हो, लेकिन अपनी करतूतों पर कभी निगाह नहीं डालते। यही तो तुम्हारा चरित्र है। जितना तुम हम मच्छरों से डरते हो और अपनी मौत के लिए हमें जिम्मेदार ठहराते हो, मेरा बस चले, तो पूरे मच्छर समाज की तरफ से इन दो टांग के जंगली जानवरों पर केस कर दूं।” मच्छर बहुत ही गुस्से से बोला।
“क्यों भाई, मैंने क्या तुम्हें निमंत्रण दिया था? कोई तार भेजा था, या कोई टेलीफोन किया था?” मैंने भी तल्ख लहजे में पूछा।
“वाह, अपने आपको पढ़ा लिखा और लेखक कहने वाले बेवकूफ, आज के जमाने में क्या तार चलता है? तार की सुविधा को बंद हुए तो जमाना बीत गया।” मच्छर ने मेरे ज्ञान को दुरुस्त करते हुए कहा।
“अच्छा, तो तुम्हें इस बात का भी पता है। फिर भी, मैंने तो तुम्हें कोई निमंत्रण नहीं दिया था कि तुम आओ, और अपनी बीन मेरे कान के पास आकर बजाओ।” मैंने कहा।
“तुम लोग हमेशा से आलसी हो, और अपना बोझ किसी और के कंधे पर लादने को ही अपनी सफलता मानते हो। शायद तुम्हारे जैसे मूर्ख लोग इसे ही सभ्यता कहते हैं, पढ़ा लिखा होना कहते हैं, या फिर होशियार होना कहते हैं, लेकिन हम मच्छर लोग इसे मक्कारी कहते हैं। तुम्हारी पूरी की पूरी सभ्यता आदमी को गुलाम बनाने के लिए ही बनाई गई है। अगर तुम अपनी सभ्यता के ग्रंथों को उठाकर देखो तो जो मैं कह रहा हूँ, वही तुम्हें देखने को मिलेगा। यह तुम्हारी जो पूरी की पूरी सभ्यता है, और जिसे तुम सिविलाइज्ड होना कहते हो, यह पूरी की पूरी मुहिम अनसिविलाइज्ड होने का उपक्रम है। तुम लोग सभ्यता के नाम पर हमेशा दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप करते हो, और खुद को महान समझने की मूर्खता करते हो। तो तुम मुझसे पूछ रहे थे कि मुझे निमंत्रण कैसे मिला है? अगर तुम्हारे जैसे लोग गंदगी न फैलाएं, कूलर और बर्तनों में पानी भरकर न रखें, तो हमें तुम लोगों के पास आकार अपनी जान गँवाने का कोई शौक नहीं है। कूड़ा करकट तुम लोग फैलाते हो, धरती को गंदा करते हो, और दोष हमें देते हो। प्रकृति सब कुछ देखती है, और अपने तरीके से न्याय भी करती है। तुम लोगों ने जंगलों को काटा, तो अब तुम लोग सांस के लिए परेशान हो रहे हो। प्रकृति ने तुम्हें दो पैर दिए थे, लेकिन तुम्हारे आलस की वजह से तुमने जानवरों को अपना गुलाम बनाया, समय को बांधने के लिए तुमने अपने वाहन बनाएं, और अपने आलस के कारण ही अब तुम लोगों से मिलना जुलना छोड़कर किसी टेलीफोन की बात कर रहे थे। प्रकृति से दूर जाने को तुम लोग सभ्यता कहते हो, यही तुम्हारी सबसे बड़ी मूर्खता है।” मच्छर ने मुझे अच्छा खासा लेक्चर पिला दिया।
मैंने टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाया और उसे खाली कर दिया। मेरे दिमाग की खिड़कियां खुल गई थी। मैंने भी कई बार इस तरह सोचा था लेकिन साला यह मच्छर, यह तो सही कह रहा था। हम आदमियों को वाकई में इस मच्छर जितनी भी अक्ल नहीं है।
“इसका मतलब यह हुआ कि तुम आदमियों से नफरत करते हो?” मैंने पूछा।
“हम मच्छरों को क्या तुमने बेवकूफ समझ रखा है? हम, तुम लोगों से क्यों नफरत करें? नफरत के कारण हमारे अंदर गुस्सा आता है, और गुस्सा आदमी को अपने आपे में नहीं रहने देता। हम मच्छर इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, और इसलिए न हम किसी पर गुस्सा होते हैं, और न किसी से नफरत करते हैं, क्योंकि हमें खुद को अपनी तरह से चलाना है, न कि आदमी की तरह से चलाना है। तुम तो साले प्यार को भी नफरत की तरह से देखते हो ….क्या अनोखा शब्द ईज़ाद किया है धोखे के लिए ….लव जेहाद। अबे! जेहाद लव के खिलाफ़ नहीं अपनी जाहिलता के खिलाफ़ करो। अव्वल तो प्यार अब आदमी में बचा नहीं, लेकिन आदमी अपनी जानवरपंती में प्यार की अनमोल ताकत को भी मौत के दरवाजे पर ले आया है।” मच्छर ने पूरे दार्शनिक अंदाज में कहा।
“यह बात तो तुमने ठीक कही कि आदमी अपने आपे में नहीं रहता। वाह, बहुत बड़ी-बड़ी और आदर्श की बातें करता है, और सदियों से करता भी आया है। मजेदार बात तो यह है कि इस युग में जो समाज सफाई का काम करता है, उसे बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है, उसका उपहास उड़ाया जाता है। उसे समाज के निचले पायदान पर रखा जाता है। उसे छूना जैसे कोई बहुत बड़ा पाप हो।” मैंने कहा।
“ओह ! रियली….. सिविलाइज्ड मैन इज़ सो फूल? तुमने तो मेरी आंखें खोल दीं, और मेरे इस विश्वास को भी पक्का कर दिया कि वाकई में आदमी इस प्रकृति की सबसे बड़ी भूल है,,,,, यह कूल सा दिखने वाला आदमी इस प्रकृति का सबसे बड़ा फूल है… हा हा हा।” मच्छर आदमी की बात करते हुए जोर से हँसा।
भले ही इस मच्छर ने आदमी का मजाक उड़ाया हो, लेकिन इस बात को तो मैं भी अच्छी तरह से जानता हूँ कि पूरी प्रवृत्ति में सिर्फ आदमी ही सबसे बड़ा बेवकूफ है, और जानबूझकर उसे कुल्हाड़ी पर पैर मारने में मजा आता है। कुल्हाड़ी पर पैर मारने को आदमी एडवेंचर का नाम देता है। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि आदमी, आदमी को मारने की ताकत हासिल करने के बाद अपने आप को भगवान समझने लगा है। वो क्या कहते हैं महाशक्ति, बिग बॉस, नियंता और अधिकारी….हा हा हा । मैं मन ही मन सोचकर मुस्कुरा रहा था।
“अरे! बहुत बेशर्म टाइप के आदमी हो, मैं तुम्हारी कमियां बता रहा हूँ, तो तुम्हारा मुँह लटक जाना चाहिए था, और तुम हो के हँस रहे हो।” मच्छर बोला।
मैं एक बार फिर से हैरान कि इस मच्छर को मेरे मन की बात कैसे पता चली। तभी मच्छर फिर से बोला, “यह जो कमियों पर हँसने वाली आदत है न आदमी की, यही आदत आदमी को इस दुनिया से खत्म कर देगी। आदमी की बेपनाह भूख ने इस प्रकृति को रहने लायक नहीं छोड़ा है। वैसे तो इस दुनिया के महामूर्ख पर्यावरण को बचाने के लिए न जाने कितने ही ढोंग करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ पूरी दुनिया के अंदर अपने विनाशक हथियारों को चलाकर आदमी का शिकार कर रहे हैं, और जीने के असली तरीके को भूल गए हैं। फिर भी बड़े लोग हैं….. तो बड़ी बड़ी बेवकूफी भी करते हैं, और ऐसा भी करते हुए वे लोग कहते हैं कि हम दुनिया को बचाने के लिए यह कर रहे हैं। किसी को मारकर क्या किसी को बचाया जा सकता है? ऐसी मूर्खता तो सिर्फ इंसान ही कर सकता है, किसी की पक्षी से या किसी जानवर से तो ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि सभ्यता नाम की बीमारी प्रकृति के दूसरे जानवरों में नहीं पाई जाती है।”
“अच्छा दोस्त! तुम जो आदमी की इतनी सारी बुराइयां मुझे बता रहे हो इसका उद्देश्य क्या है?” मैं मच्छर की ज्ञान भरी बातों से सचमुच हैरान हो गया था, और मेरे पास पूछने के लिए इससे बढ़िया कोई सवाल नहीं था।
“वाह….. पढ़े लिखे होने की नौटंकी करने वाले झूठे आदमी, तुम्हें आदमी को बचाने की चिंता सही में करनी चाहिए। तुम लिखने पढ़ने वाले लोगों से ही हम मच्छरों को थोड़ी उम्मीद है, वरना तो हम किसी ऐरे-गैरे से बात करना पसंद नहीं करते। अगर मैंने तुम्हें अपनी बात समझाई है तो इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ यही है कि हम नहीं चाहते कि पृथ्वी और प्रकृति आदमियों से विहीन हो जाय। मच्छर हैं, हम कोई आदमी थोड़े ही हैं, जो दुश्मन को मारने के बाद समझता है कि दुश्मनी खत्म हो गई। रक्षा और बदला लेना प्रकृति का स्वभाव है, लेकिन श्रेष्ठता खुद पर काबू पाने का नाम है। आज के आदमी को किसी भी चीज पर काबू नहीं रहा, इसलिए आदमी को श्रेष्ठ कहाने का कोई हक नहीं है। मैं तुम्हें यही बताने आया था कि हम मच्छरों पर अत्याचार बंद करो। तुम्हारी गंदगी की वजह से हम मच्छर पैदा होते हैं। तुम हमें बेकार में ही अपना दुश्मन मानते हो, जबकि हमारा जन्म ही इस कारण से होता है कि तुम गंदगी फैलाते हो। हम मच्छर तो इंसान को जगाने का काम करते हैं। हम आदमी के कान में जाकर बार-बार कहते हैं कि सफाई रखो, हर तरह की सफाई रखो। यह जो तुम्हारा वैचारिक प्रदूषण है और जो सदियों से इंसान को जोड़ने के बजाए इंसान को बांटता हुआ आया है उसे खत्म करो, वरना आदमी का यह वैचारिक प्रदूषण और आदमी का आदमी से, आदमी की तरह ही व्यवहार न करना, इस प्रकृति के उपवन से आदमी नाम के फूल को सदा के लिए समाप्त कर देगा। यह समझने की भूल मत करना कीकि एक मच्छर ने तुमसे कहा है। और मेरी बात तालियां बजाने वाली तो बिल्कुल नहीं है, क्योंकि मैं हिजड़ो के ऊपर तालियां नहीं बजाता। हम भले ही मच्छर हैं, लेकिन आदमी की दूसरों के ऊपर हँसने की आदत को हमने कभी नहीं अपनाया। हम इसे फूहड़ मनोरंजन की श्रेणी में रखते हैं। मेरे लक्कड़ दादा के लक्कड़ दादा ने एक किताब में लिखा था कि आदमी का शिकार करना बहुत मुश्किल है। प्रकृति ने उसे एक बहुत बड़े शाहकार के रूप में पैदा किया है, लेकिन आदमी को न तो अपनी स्थिति का ज्ञान है, और न ही अपनी परिस्थिति का ज्ञान है। यही अज्ञान उसके पतन के बाद उसकी समाप्ति का कारण बनेगा। भले ही तुम मेरी बातों को एक मच्छर की बात समझकर हवा में उड़ा दो, लेकिन याद रखना, यह जो इंसानियत का लबादा ओढ़े रहते हो न…. यह तो एक क्वालिटी का नाम है, वरना तो तुम सब लोग दो पैरों पर खड़े हुए चौपाये ही हो।”
मैं मच्छर की तरफ देख रहा था और सचमुच इस मच्छर की बातों ने मेरे दिमाग की घंटियों को बजा दिया था। तभी कमरे में मेरी पत्नी आई और उसके हाथ में मच्छर मारने की दवाई का बोतल था। मच्छर सचमुच बहुत चालाक था। वह मेरे राइटिंग पैड से उड़ कर जा चुका था।
“किस से बातें कर रहे थे?” पत्नी ने कमरे में दवा छिड़कते हुए पूछा।
“रहने दो, कुछ न पूछो। तुमने मेरा बहुत बड़ा नुकसान कर दिया है। सफाई ही सबसे बड़ा त्यौहार है, आओ! मैं भी सफाई करता हूँ। आज मुझे एक मच्छर ज्ञान देकर गया है।” मैंने कहा।
“हा हा हा ….. मच्छर ज्ञान देकर गया है, वाह…. अब यही सुनने को बाकी रह गया था। लगता है जल्द ही तुम्हें पागलखाने भेजना पड़ेगा।”
और वह मुझपर हँसते हुए कमरे से बाहर चली गई। मैं खुश था, पत्नी ने कुछ अलग नहीं किया था, यही तो हम लोग जब से प्रकृति ने हमें जन्म दिया है, तब से करते चले जा रहे हैं। हमारी आंखें हैं, लेकिन हमने देखना नहीं सीखा है। हमारे कान हैं, पर हमने सुनना नहीं सीखा है। हमारे पास बुद्धि है, पर हमने आचरण करना नहीं सीखा है। मच्छर ने सही ही कहा है कि आदमी खुद अपने नाश का कारण बनेगा।

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