अगले जनम मोहे, बिटिया ना कीजो…
मेरी कलम से…
आनन्द कुमार
अरे ! चुप,
कैसी हैवानियत की!
बात करते हो,
बेटी मरी है….
उसे दलित, पिछड़ा, अगड़ा,
से क्यों जोड़ते हो ?
उन बेशर्मो, कुकर्मियों,
के घृणित, घटिया कर्म से,
जाति और धर्म को,
क्यों जोड़ते हो ?
यही तो चाहते हैं,
समाज को जोड़ने की,
मंचों से वकालत करने वाले,
जो सोशल वार में तुम,
एक दुसरे पर उड़ेलते हो।
धैर्य रखों, धीरज रखों,
आतताइयों के इस घिनौने कर्म पर,
नहीं तो तेरे विरोध में,
वे सेंक लेंगे अपने मकसद की रोटी,
परोस लेंगे, खुद की थाली में,
तुम्हें नफ़रतों के द्वंद में,
अकेला छोड़कर।
इसलिए जब कोई बेटी,
किसी दरिंदगी की शिकार हो,
तो उसका जाति मत देखना,
उसका मजहब मत तौलना,
सच में यारों किसी “गुड़िया” को,
किसी “मनीषा” को,
फिर कभी छोटी-बड़ी मत कहना।
नहीं तो दरिंदों के पाप से,
मर कर तड़प रही बेटी,
हमारे तुम्हारे जाति बंटवारे में,
फिर तड़पेगी,
जल चुकी चिता,
शांत हो चुकी लपटे,
फिर रोएंगी,
आत्मा कराहेगी, मानवता पुकारेगी,
शहीद हो चुकी “मनीषा”,
पाताल में चिल्लाएगी,
अगले जनम मोहे, बिटिया ना कीजो।
अगले जनम मोहे, बिटिया ना कीजो।।

