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कल के चक्कर में बेमौत मर रहे लोग

अखबार का कोना:आज
(ऋषिकेश पाण्डेय)

■ सात सौ चिताएं जलने का गवाह बना मुक्तिधाम, इलाज के अभाव में मौतों का सिलसिला जारी

मऊ।वैश्विक कोरोना संकट से निबटने के लिए किये गये लाकडाऊन ने अब तक अनगिनत ज़िन्दगियाँ छीन ली हैं।जिसका जिला प्रशासन के पास कोई आंकङा उपलब्ध नहीं है।दोहरीघाट स्थित मुक्तिधाम के चेयरमैन गुलाबचंद गुप्त के अनुसार 22मार्च से19 अप्रैल तक सात सौ से अधिक चिताएं वहां जलायी गयी हैं। दूसरी ओर नगर पालिका परिषद मऊ के पूर्व अध्यक्ष अरशद जमाल ने कहा कि लाकडाऊन के दौरान इलाज के अभाव में शहर में भी ढेरों लाशें नगर के कब्रिस्तानों में दफनाई गयी हैं। जिसके वे खुद चश्मदीद गवाह हैं।यही नहीं,बेमौत मरे लोगों की मुहल्लेवार जानकारी भी उन्होंने दी और कहा कि कईयों को तो लेकर वे खुद निजी अस्पतालों के चक्कर लगाये,जहाँ इलाज करने से इंकार कर दिया गया।जिला अस्पताल पहुंचे तो वहां इलाज के बजाय रेफर कर पिण्ड छुङा लिया गया।ऐसी घटनाओं की जानकारी व्यक्तिगत रूप से उन्होंने ज़िलाधिकारी को खुद उपलब्ध करायी।
इसप्रकार कोरोना को लेकर छिङी जंग में बेमौत मरते लोगों का कोई पुरसाहाल नहीं दिख रहा है और इलाज के अभाव में बीमार लोगों का जनाजा उठने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।कोपागंज थाना क्षेत्र के भरत मिलाप मैदान निवासी छांगुर उम्र 52 वर्ष की मौत ने तो समूची मानवता को ही झकझोर कर रख दिया।जो, गोलगप्पे और चाट बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।जिनके दो बेटे लाकडाऊन में बाहर फंसे हुए हैं।जो मजदूरी करने के लिए मुम्बई गये हुए थे।बताया जाता है कि बीमार होने के बाद पड़ोसियों ने यद्यपि कि पङोस धर्म का निर्वाह करने में कोई कोताही नहीं की।लेकिन,वे भी उनको बचाने में कामयाब नहीं हो सके। फोन करने के बाद भी उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस तक मुहैया नहीं हो पायी,तब पङोसी किसी तरह लाद-फादकर उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर ले गये। जहां इलाज के नाम पर हाथ खङे कर लिए गये।
कई प्राइवेट अस्पतालों पर भी दस्तक दी गयी। लेकिन,किसी ने इलाज करने की जहमत नहीं उठाई।जिला अस्पताल ने भी समुचित इलाज नहीं किया और बीएचयू के लिए रेफर कर दिया।जहां एम्बुलेंस के इंतज़ार में छांगुर ने जिला अस्पताल के बाहर ही दम तोड़ दिया।जिससे उनकी पत्नी सुधा को तीन पुत्रियों की चिंता सता रही है,वहीं मुम्बई में फंसे उनके दोनों पुत्रों को पिता की अर्थी को कंधा न दे पाने का मलाल ताउम्र सालता रहेगा। छांगुर की मौत तो एक नजीर मात्र है। न जाने ऐसी कितनी मौतें हुई हैं। जिनका आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है या छिपाया जा रहा है। बहरहाल, जिन घरों से आजकल अर्थियां उठ रही हैं। उन घरों में मातम से कहीं ज्यादा मानवता की चित्कार सुनायी पङ रही है।आपसी भाईचारे वाले देश में नफ़रत की बयार इस कदर बह रही है कि अर्थियों को कंधा देने वाले लोग भी बमुश्किल ही मिल पा रहे हैं। रिश्तेदारों का अंतिम संस्कार में शामिल हो पाना तो दूर की बात हो गयी है। सीमाएं सील हैं,आवश्यक सेवाओं का हाल बुरा है।मानवता कराह रही है,जनभावनाएं सिसक रही हैं।कल की मौतों को लेकर लोग खौफ़जदा हैं।मगर,आज की मौतों का कोई पारावार नहीं है।

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