कोरोना काल और उसके बाद की प्रगति
शालिनी श्रीवास्तव…
मुक्त लेखिका
क्या फिल्मस्टार क्या नेता क्या गरीब क्या अमीर, कोरोना ने सबको एक ही धरातल पर लाकर रख दिया है। ना नौकर- चाकर, ना बॉडीगार्ड और ना ही ठाठ-बाट । करोडो की गाड़ियां धरी की धरी रह गयी, आएदिन की फर्स्टक्लास की विदेश यात्रा और रोज़ की पार्टी भी ना रही । इसवक्त कोई ना बाहर जा सकता है ना कोई घर के भीतर ही आ सकता है । इस पृष्टभूमि में 1973 में बनी फिल्म बॉबी का एक गीत बड़ा ही प्रासंगिक लगता है,
बहार से कोई अंदर ना आ सके
अंदर से कोई बहार ना जा सके
सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो
सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो
हम तुम एक कमरे में बंद हो
और चाभी खो जाए …….
इस गंभीरता भरे माहौल में हम गीत भले ही ना गा सके मगर यह जरूर सोच सकते है कि पुराने ज़माने के हमारे हिंदी गाने ने कैसे भविष्य को पहले ही भाप लिया था । उसवक्त भले किसी ने ना सोचा हो कि यदि बहार से कोई अंदर नहीं आएगा और अंदर से बाहर कोई नहीं जायेगा तो क्या होगा? लेकिन आज यह कोरोना से बचने का सबसे कारगर तरीका है । अगर हम सब इस बात को उसवक्त गंभीरता से सोच लिए होते तो आज हमारे पास एक और विकल्प मौजूद होता कि ऐसी स्थिति में घर में रहकर और क्या- क्या किया जा सकता है । उसवक्त से सोशल डिस्टेनसिंग बनाए रखने का अभ्यास होता तो आज ये कोरोना-वोरोना होता ही नहीं । कोरोना ने वैश्विक स्तर पर एक तरह से डिस्टेनसिंग बना दिया है । यह महामारी समाज में छुआछूत से भी ख़राब असर डालेगी । इसके खत्म होने के बाद भी लोग एक दूसरे से मिलने से कतराएंगे । क्या ऊँचा क्या नीचा अब तो हर जाति के लोगो में अलगाव हो जाएगा, जिसे दूर करने में बहुत समय लग जायेगा। इसके लिए अभी से प्रयास शरू कर देना चाहिए ।आज अपना देश ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर लोग घरों में बंद है । एक समय था जब भूमंडलीकरण पर जोर दिया गया और अब ऐसा समय आ गया है कि ना सिर्फ संपूर्ण देश बल्कि राज्य भी अपने से सटे राज्यों की सीमाएं सील कर रहे है । ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ कोरोना काल के लिए है । कोरोना काल के बाद भी पहले जैसी स्थिति बहाल करने में बहुत समय लग जायेगा । यह राष्ट्र के लिए स्वास्थ्य आपातकाल है । देश अभी ऐसे आपातकालों के लिए सक्षम नहीं है । आज पूरा विश्व एक ऐसे विषाणु से लड़ रहा है जिसे वह खुली आँखों से देख नहीं सकता। शायद यह पहली बार है कि बड़े से बड़े देश और तमाम सुविधाओं ,अनुसंधान के होने के बावजूद एक वायरस को हराने में विश्व असहाय सा दिख रहा है । तमाम बड़े राष्ट्रों ने अंतरिक्ष तक अपनी पहुँच बना ली है । विज्ञान और प्रौधोगिकी के नए युग में प्रवेश करने के बाद जहाँ मानव खुद को सबसे शक्तिशाली होने का दावा पेश करता है, आज विवश दिख रहा है । सारी विकास -प्रगति एक ओर खड़ी है और सरकारें विवश है । आतंकवाद और राजनीति भी अचंभे में है । हालांकि इस परिस्थिति में भी कुछ लोग और देश आतंकवाद ,ऑयल -वार जैसे कार्यो को अंजाम देने में पीछे नहीं है । मानवता दोराहे पर है । आज जब विश्व में शांति और सहयोग की भावना का विकास होना चाहिए , राष्ट्र अलगाव की नीति पर आगे बढ़ रहे है । यह अलगाव सोशल डिस्टेनसिंग वाला नहीं बल्कि वैश्विक मंचों का अलगाव है । वैश्विक शक्तियों और मंचों में समन्वय का अभाव दिख रहा है । अकेले रहना बीमारी से बचाव है मगर साथ में हल निकालने से बीमारी को मात दिया जा सकता है ।
आज विश्व की महाशक्तियां मौन है । कोई वैश्विक लीडर ना है और ना ही बनाने की कोशिश ही कर रहा है । ऐसे में भारत अपनी समेकित संस्कृति, मानवतावाद को लेकर वैश्विक लीडर की भूमिका में आ सकता है । और पिछले दिनों का उसका प्रयास भी यही दिखाता है। क्षेत्रीय मंचों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये एकजुटता का संदेश देना और अमेरिका को ड्रग्स की आपूर्ति देश की रणनीतिक कूटनीति और प्रभावशीलता को दर्शा रहा है ।
कोरोना ने विश्व को कई साल पीछे धकेल दिया है । विकासशील और अल्प विकसित राष्ट्रों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है । ऐसे में अगर अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता और मानवता का ह्रास होता है तो इसका असर पूरी मानव सभ्यता पर पड़ेगा । कोरोना के बाद की भी स्थितियां भयावह हो सकती है इसके लिए पहले से ही सचेत रहने की आवश्यकता है । कोरोना काल के बाद जब लोगों के पास रोजगार नहीं होगा,खाने को अन्न नहीं रहेगा,कृषि चौपट हो चुकी होगी,बाज़ार बंद पड़े होंगे तो निश्चित ही संघर्ष होगा, जिससे अराजकता में वृद्धि होगी । जब आज देश अर्थव्यवस्था में गिरावट,रोजगार की कमी और हर स्तर पर असमानता का सामना कर रहा है तो कोरोना काल के बाद की स्थिति का आकलन करना मुश्किल है । इसके लिए वैश्विक समुदाय की एकजुटता आवश्यक होगी ।
कोरोना महामारी ने भविष्य के प्रति मानवों को सचेत कर दिया है और यह साबित कर दिया है कि प्रकृति के सामने हमसब बौने है । प्रगति की बात तो तब होगी जब मानव शेष बचेंगे । जब मानव पर ही जान जाने का खतरा मंडराएगा तब वह विकास कैसे करेगा और इस विकास का होगा क्या ? विज्ञान के विकास ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि प्रकृति के विनाश से नए- नए तरह के रोगों का सामना करना पड़ सकता है । ऐसे में आज कोरोना तो कल कुछ और बीमारी आ सकती है । अतः हम सब को अब प्रकृति को लेकर अधिक सजग हो जाना चाहिए तथा ज्यादा से ज्यादा ध्यान रिसर्च और इनोवेशन पर देना चाहिए ताकि आगे आने वाली बीमारियों का जल्द से जल्द पता लगाकर हम उससे निज़ात पा सके । प्रकृति की रक्षा अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर अहम लक्ष्य होना चाहिए न की औधोगिक विकास ।
आज जब सभी स्कुल -कॉलेज बंद है ,परीक्षाएं टल चुकी है ,ऑफिसों में ताला लगा है, कृषि कार्य ठप्प है , कल – कारखाने में भी तालेबंदी है तो ऐसे में विकास कहाँ है? ऐसे माहौल में चाहे किसी भी स्तर का कार्यकर्ता हो ,चाहे किसी भी टॉप पोजीशन में हो आज वह शून्य है । घरों में कैद कुछ विशिष्ट लोग आज देश के आह्वाहन पर अपना योगदान दे रहे है आज वे लोग ही सच्चे देशभक्त और हीरो है जैसे आज मीडिया तथा डॉक्टर जनता के लिए हीरो है। आज बाहरी संस्थानों से सूचना और चिकित्सीय सुरक्षा की दरकार है और घर के भीतर दो वक्त के अनाज के प्रबंधन की चिंता ।
कोरोना काल में आज प्रसाशन अपनी भूमिका जरूर निभा रहा है लेकिन प्रशासकीय प्रबंधन तो आज भी उतनी मुस्तैदी से काम नहीं कर रहा है जितनी करनी चाहिए। यह हमेशा से घटना होने के बाद हरकत में आता है । अगर ये पहले से सचेत होते तो शायद यह इम्पोर्टेड बीमारी,भारत को विचलित नहीं कर पाती । फिर भी इस काल का यह सर्वोत्तम समन्वय है जहाँ केंद्र और राज्यों के फैसलों में एकता है वही क्षेत्र फैसलों को लागू करने में तेजी दिखा रहे है।
इस काल ने आडंबर और दिखावे को भी मुँह चिढ़ा दिया है । मॉल से लेकर मंदिर तक सब बंद पड़े है । आज जरुरत है संयम और सफाई की तथा अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की । आज समय है खुद को समय देने की । जो ये बात कहते नहीं थकते थे कि मेरे पास समय नहीं है आज उनके पास उतना समय है कि समय काटे नहीं कट रहा । अतः अब खुद को समय दे और अंतर्मन से विचार करे कि हमाने कितना विकास किया और इस वक्त हमारी प्रगति कहाँ है ? और हमे आगे कैसा जीवन चाहिए?

