राजनीतिक संघर्षों का नाम था राजनारायण: दिव्येन्दु राय
मऊ। जनपद के घोसी नगर में लोकबंधु राजनारायण जी की 32वीं पुण्यतिथि मनाई गयी। आयोजक वरिष्ठ समाजसेवी श्री दिव्येन्दु राय ने कहा की राजनारायण जी का जन्म 15 मार्च 1917 को बनारस में हुआ एवं उनकी मृत्यु 31 दिसम्बर 1986 को नई दिल्ली में हुई। राजनारायण जी ने अपने जीवनकाल में 80 बार से भी ज्यादा जेल यात्राएं की।
एक पुराना एक वाकया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के जनतंत्रीकरण व शिक्षा में आमूल परिवर्तन की अपनी मांग राष्ट्रपति को बताने के लिए कुछ छात्रों ने तीन नवंबर 1971 को राष्ट्रपति भवन में प्रवेश किया। छात्र नारा लगाते हुए अंदर घुसे। सुरक्षाकर्मियों ने बंदूकें तान ली थीं, पर जान की किसको परवाह थी! गिरफ्तार करके छात्रों को तिहाड़ जेल भेजा गया। राजनारायण जी तब राज्यसभा सदस्य थे। उनके हस्तक्षेप से छात्रों को रिहा किया गया। रिहाई के बाद राष्ट्रपति के बुलावे पर राजनारायण जी के साथ छात्रों ने उन्हें अपनी बात बताई। अन्य बातों के अतिरिक्त राष्ट्रपति ने हमसे कहा, मैं तो मेहमान हूं, राष्ट्रपति तो आते-जाते रहेंगे, राष्ट्रपति भवन देश और जनता की अमानत है।
ऐसे मौकों पर राजनारायण जी हमेशा याद आते हैं। बगैर सत्याग्रह व संघर्ष के वह लोकतंत्र को बेजान मानते थे। अपने पथ के अकेले पथिक थे- एक पैर जेल में, दूसरा पैर रेल में। जेल के बाहर रहने पर एक ही स्थान पर दो दिन ठहरना उनके लिए मुश्किल था। वह रमता जोगी-बहता पानी थे। वह काशी के थे। भारतीय राजनीति के कबीर थे। कबीर भी काशी के थे। जो घर जारे आपना चलै हमारे साथ।
राम मनोहर लोहिया उनके आदर्श व प्रेरणा, दोनों थे। उनके विचारों को साकार करने में वह जीवनर्पयंत लगे रहे। उनके व्यक्तित्व में हनुमान का बल था। लोहिया जी के जीवित रहते उन्होंने कई ऐतिहासिक सत्याग्रह व आंदोलन किए। 1956 में काशी विश्वनाथ मंदिर में हरिजन प्रवेश आंदोलन, अंग्रेजी हुकूमत की महारानी विक्टोरिया की काशी में लगी मूर्ति का भंजन आंदोलन, गरीबों को रोटी दिलाने के लिए विधानसभा में सत्याग्रह, जो जमीन को जोते-बोए, उसको जमीन का मालिक बनाने के लिए सत्याग्रह, आदि।
आशुतोष शाही ने कहा 1971 में वह रायबरेली से लोकसभा का चुनाव इंदिरा गांधी से हार गए। उन्होंने चुनाव को रद्द करने के लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की, तो सब लोग उन पर हंसे। लेकिन जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा का फैसला आया, तो एक नया इतिहास बन गया। चुनाव रद्द हो गया। उस फैसले के बाद जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में ऐसा जबर्दस्त उबाल आया कि देश में भूचाल आ गया था। देश में आपातकाल लगाना पड़ा और इसके बाद राजनारायण ने उसी रायबरेली से इंदिरा गांधी को चुनाव हराकर एक इतिहास रचा। वह आजीवन व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्षरत रहे।
श्री दिव्येन्दु राय ने कहा 1977 वह साल था जब पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई थी,इस आम चुनाव की एक और बड़ी खबर थी। वह खबर थी- लाेकसभा चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की रायबरेली में हार। उन्हें 55,202 मताें से हराया था भारतीय लाेकदल के प्रत्याशी राजनारायण जी ने।इंदिरा गांधी काे सिर्फ 1,22,517 मत मिले थे, जबकि राजनारायण काे 1,77, 719 मत, कुल चार प्रत्याशी थे। अपने जीवन में इंदिरा गांधी लाेकसभा चुनाव में सिर्फ एक बार हारीं वह भी अपने गढ़ से,इस हार के बाद इंदिरा गांधी ने रायबरेली से कभी चुनाव नहीं लड़ा। इंदिरा गांधी काे दुनिया की ताकतवर राजनीतिक हस्तियाें में माना जाता था। मनमाफिक व्यवस्था बनाने के लिए खुद की बनाई व्यवस्था को तोड़ने में उन्हें कोई मोह न हुआ। आज के नौजवानों को इसी जज्बे की जरूरत है। इस दौरान प्रमुख रूप से अंकित राय,आशुतोष राय,अदभुत त्रिपाठी, सतीश कुमार, नखड़ू, सौरभ, वैभव, अन्नू आदि उपस्थित रहे।

