आजमगढ़ के नवागत जिलाधिकारी एक दिलेर नौकरशाह हैं
■ क्या आप एनपी सिंह को जानते हैं?
■ कविताएं करते ही नहीं जीते भी हैं।
®अरविंद सिंह
बात उन दिनों की है जब आजमगढ़ और मऊ के भूगोल के बीच सरहदी विभाजन की रेखा नहीं खीचीं थी।आजमगढ़ का अर्थ था राहुल की ‘कनैला की कथा’और श्याम नारायण पांडे की ‘हल्दी घाटी’ की रचनाभूमि और उनकी साझी अदब़ी ज़मीन।हिंदी साहित्य को भाषिक चरित्र देने वाले हरिऔध का ‘प्रिय प्रवास’ की त्वरा और अल्लमा के ‘आंगन’ में नूर मोहम्मद का सूफियाना साहित्य।
ऐसे ही समय में कोई तीन चार दशक पहले आजमगढ़ के मोहम्मदाबाद तहसील में एक युवा नौकरशाह उपजिलाधिकारी बनकर आया। नाम था नागेन्द्र प्रसाद सिंह ‘एनपी सिंह’। विश्वविद्यालयी उत्साह और समाजवादी ज़मीन की त्वरा से उफ़ान लिया यह अधिकारी, दरअसल एक्टिविजम़ को जीने लगा था। यह उस वक्त़ के पूरब के आक्सफोर्ड का जज्ब़ात था जो युवाओं को अफसर से ज्यादा एक जिम्मेदार लोकसेवक पहले बनाता था। सरकारी कार्यशैली और अफसरशाही की हनक से दूर, जमीनी समस्याओं को दूर करने का जज्ब़ा, एनपी सिंह को भी एक जुनूनी अफसर में तब्दील करते चला गया। 
दशकों से वलीदपुर-भीरा(वर्तमान में मऊ) में होलिका दहन और रमजा़न को लेकर हिन्दु मुसलमानों के बीच एक गंभीर विवाद, लंबे समय से चला आ रहा था। यह विवाद दोनों मज़हबों के बीच खूनी संघर्ष और धार्मिक तनाव का कारण बना हुआ था। मामला न्यायालय में भी विचाराधीन था। लोगों के बीच अघोषित कर्फ्यू जैसी स्थिति पैदा हो गयी थी। राजनेता इसे सियासी रंग देकर इसका राजनीतिक इस्तेमाल करना भी शुरू कर दिये थे।उस समय के मऊ ही नहीं, पूर्वांचल के प्रखर कांग्रेसी नेता कल्पनाथ राय की राजनीति में तूती बोलती थी। इस मुद्दे का हल शायद उनके पास भी नहीं था या राजनीति निकालना ही नहीं चाहती थी।
ऐसे समय में इस युवा एसडीएम ने यहाँ के परिवेश और उसके मानस को पढ़ा। उसका कर्तव्य और जनसरोकारी चरित्र उसे इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने के लिए अंदर तक मँथ रहा था। फिर क्या समाजवादी जमीन और युवा अधिकारी के समाधान निकालने की जिद् उसे एक दिन वलीदपुर पहुँचा दिया और जनमुखी स्वाभाव उसे लोगों के बीच वार्ताकार बना दिया। अब समस्या पर चर्चा और परिचर्चा होने लगी। दोनों मजहबों के वरिष्ठ एवं जिम्मेदार ग्रामीणों और प्रधानों के बीच समाधान के रास्ते तलाशे जाने लगें। लेकिन दोनों ही तरफ से कुछ ऐसे लोग भी थे, जो राजनीति कर रहे थें।और समस्या के समाधान में नहीं बल्कि समस्या को बनाएं रखने में दिलचस्पी रखते थे। कहते हैं कि ‘मान लो तो हार है, और ठान लो तो जीत’।और एनपी सिंह ने एक दिन ठान ही लिया कि ‘इसका समाधान निकाल कर ही मानूंगा’।
जब दोनो समुदाय के बीच बातचीत का यह नतीजा कुछ खास असर नहीं दिखा सका त़ो वे इस जन समस्या के लिए ग्रामीणों के बीच ही अनशन पर बैठ गए। यह ख़बर जंगल की आग की तरह फैलती चली गयी। और कलेक्टर ने कहा कि,’भाई यह क्या कर रहे हो?तुम्हारा काम यह नहीं है।आज नहीं तो कल समाधान निकल ही जाएगा ही’ लेकिन एनपी सिंह को समाधान से नीचे कुछ भी मंजूर नहीं था। यह जिद् दृढ़संकल्प बनता गया और दृढ़संकल्प आत्मविश्वास।नतीजा यह निकला कि पत्थर पिघलने लगे। विशेषकर आस पास के युवाओं और छात्रों ने इस अपनी भी मुहिम बना लिया।दोनो समुदायों की ओर से कुछ जिम्मेदारों ने इसे हल करने के लिए आगे बढ़े,नौजवानों ने हिम्मत बधाई।और लगभग पाँच हजार की भीड़ ने अंतिम स्वीकृति प्रदान कर दी कि ‘जैसा साहब तय कर देगें सभी मान लेगें’। फिर क्या एनपी सिंह के भीतर का जिद् और समाधान का करार आगे बढ़ा,ल़ोग पीछे -पीछे आने लगे।उन्होंने स्वयं फावड़ा उठाया और और विवादित स्थल के बीचोबीच एक आम रास्ता बना दिया।जिस पर हिन्दु भी चलेगा और मुसलमान भी चलेगा।लेकिन उनके पूजा स्थल नहीं रहेगें।वे रहेंगे जरूर लेकिन एक का सड़क के इस पार तो दूसरे समुदाय का दूसरे उस पार और बीच में दोनों अपने गंतव्य तक ले जाने वाली सड़क बना दी गई। इस समाधान से सभी न केवल संतुष्ट हुए बल्कि हजारों की भीड़ भी फावड़ा लेकर मैदान में उतर गयी और श्रमदान से एक सड़क बन गई। इस घटना ने एनपी को अधिकारी से ‘एक्टिविस्ट अधिकारी’ के रूप में लोगों के मानस में स्थापित कर दिया। यही सफलता राजनीतिज्ञों को पंसद नहीं आयी और एक दिन उन्होंने इसी सजा के तौर पर स्थानांतरण करवा दिया। लेकिन आज भी यहाँ न तो दंगा होता है और नहीं आपसी तनाव।बल्कि सभी लोग प्रेम पूर्वक रहते हैं। यह एक अधिकारी का एक्टिविजम था,जो उसे लोगो का नायक बना दिया। दरअसल यह उनके एक्टिविजम की शुरूआत भर थी। नौकरी के दौरान एनपी सिंह के तबादले जरूर हुए लेकिन जनसेवा की भावना और जुनून हमेशा बने रहे।आम आदमी के जीवन में,वंचित और अभावग्रस्त समुदाय के जीवन में उजाला कैसे आए यह सोच उन्हें औरों से पृथक करती है। आज सरकार ने उन्हें ग्राम्य विकास आयुक्त,मनरेगा निदेशक और आजीविका मिशन के निदेशक पद की महती जिम्मेदारी सौंपी है।जिसे बखूबी निर्वहन किया जा रहा है।और आम आदमी के जीवन में परिवर्तन लाया जा रहा है।योगी सरकार ने उन्हें अब आजमगढ़ कलेक्टर बनाकर भेजा।
( लेखक शार्प रिपोर्टर मैगजीन व मनमीत मैगजीन के सम्पादक हैं)

