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स्थायी लोक अदालत ने विद्युत विभाग पर ठोका 50 हजार का जुर्माना

◆ कोर्ट ने कहा दोषी अधिकारी व कर्मचारियों के वेतन से वशूल की जाय छतिपूर्ति कि धनराशि

मऊ। शुक्रवार को स्थायी लोक अदालत ने एक ही परिषर में एक व्यक्ति के नाम से दो घरेलू कनेक्शन देकर दोनो का बिल उपभोक्ता को भेजा जबकि एक ही कनेक्शन का उपयोग उपभोग उपभोक्ता द्वारा किया जा रहा था, बावजूद इसके आर. सी जारी कर विभाग उपभोक्ता प्रताड़ित किया गया जिसे कोर्ट ने गम्भीरता से लेते हुए विद्युत विभाग पर 50 हजार रुपये का जुर्माना ठोका। मामला घोसी थाना क्षेत्र के ग्राम लाखीपुर पीढ़वल निवासी बीरबल मौर्य पुत्र जंगई मौर्य से जुड़ा है। बीरबल ने घरेलू उपयोग के लिए 10 फरवरी 1997 को एक किलोवाट विद्युत कनेक्शन हेतु आवेदन किया था, लेकिन विभागीय त्रुटि के कारण उनके नाम से एक ही परिसर में दो घरेलू विद्युत कनेक्शन जारी कर दिए गए। जबकि उपभोक्ता केवल एक ही कनेक्शन का उपयोग कर रहा था। जब उन्हें इस गड़बड़ी की जानकारी हुई तो उन्होंने विद्युत विभाग के अधिकारियों से कई बार लिखित एवं मौखिक शिकायत की। विभागीय जांच में भी गलती स्वीकार की गई, लेकिन इसके बावजूद दूसरे कनेक्शन को बंद नहीं किया गया और लगातार बिल भेजा जाता रहा। हद तो तब हो गई जब वर्ष 2023 में कथित बकाया बिल के आधार पर उपभोक्ता के विरुद्ध आरसी जारी कर दी गई और उस पर भुगतान का दबाव बनाया जाने लगा। विभागीय चक्कर लगाने और लगातार प्रताड़ना झेलने के बाद बीरबल मौर्य ने न्याय की उम्मीद में स्थायी लोक अदालत, का दरवाजा खटखटाया। प्रकरण की सुनवाई अध्यक्ष हीरा लाल, न्यायपीठ के सदस्य विकास भाई निकुम्भ एवं सदस्या स्नेहलता की पीठ ने सुनवाई शुरू किया, न्यायपीठ ने शुरुआत में सुलह-समझौते के माध्यम से विवाद का समाधान कराने का प्रयास किया, लेकिन विभाग अपनी गलती होने के बावजूद समाधान के लिए तैयार नहीं हुआ। इसके बाद न्यायपीठ ने मामले का गुण-दोष के आधार पर विचारण किया।
पत्रावली में उपलब्ध साक्ष्यों और विभागीय जांच के तथ्यों के अवलोकन के बाद न्यायपीठ ने पाया कि वर्ष 1997 से उपभोक्ता को विभागीय गलती के कारण अनावश्यक रूप से दो कनेक्शनों का बिल भेजा जाता रहा। कई बार शिकायत और जांच में गलती सामने आने के बावजूद विभाग ने सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की। इसके विपरीत वर्ष 2023 में आरसी जारी कर उपभोक्ता पर भुगतान का दबाव बनाया गया। न्यायपीठ ने इसे गंभीर विभागीय लापरवाही और उपभोक्ता को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाला कृत्य मानते हुए विद्युत विभाग को निर्देश दिया कि याची को उसके प्रार्थना पत्र देने की तिथि से 50 हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति के रूप में एक माह के भीतर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित चेक के माध्यम से भुगतान किया जाए। निर्धारित समय में भुगतान नहीं करने पर ब्याज की दर आठ प्रतिशत वार्षिक देय होगी। न्यायपीठ ने अधीक्षण अभियंता को एक और महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि इस प्रकरण में आंतरिक जांच कर उन अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जिम्मेदारी निर्धारित की जाए, जिनकी लापरवाही के कारण विभाग को उपभोक्ता को क्षतिपूर्ति देनी पड़ रही है। उस धनराशि संबंधित दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन से वसूल कर विभागीय खाते में जमा कराना सुनिश्चित किया जाए। आदेश के उपरांत पीठ ने कहा कि यह आदेश केवल एक उपभोक्ता को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी विभागों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि नागरिकों को विभाग की गलती के लिए दंडित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। सरकारी विभागों की जिम्मेदारी है कि वे शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण करें और अपनी त्रुटियों को स्वीकार करने के साथ उन्हें सुधारें भी। वहीं आम नागरिकों के लिए यह फैसला संदेश देता है कि विभागीय उत्पीड़न के सामने चुप रहना जरूरी नहीं है। अपने अधिकारों के लिए उचित कानूनी मंच पर आवाज उठाने से न्याय मिल सकता है। स्थायी लोक अदालत जैसी संस्थाएं आमजन को सुलभ न्याय दिलाने और विवादों का समाधान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
सरकारी विभाग की गलती का खामियाजा आम नागरिक को नहीं भुगतना पड़ेगा और लापरवाही करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी।

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