शब्द मसीहा की कहानी : बिंदी
मनोज को शहीद हुए तीन साल गुजर गए थे ! यूं तो भरा-पूरा घर था और किसी तरह की परेशानी नहीं थी मगर मनोरमा के जीवन की रिक्तता कौन भर सकता था । जब से भैया की शहादत हुई देवर -भाभी का चुहल जैसे समाप्त हो गया था । अभिनव ने खुद को कमरे में एक तरह से कैद कर लिया था । बहुत कम बाहर निकलता था । बस पेंटिंग बनाते रहना या कोई किताब पढ़ते रहना । ज्यादा हुआ तो कभी खेतों पर निकल जाता अकेला । जब भी कोई अभिनव के कमरे में जाता वह अपनी एक खास पेंटिंग को छिपा देता । मना कर देता कि कोई उसे देखेगा नहीं । सब उस कौतूहल को जानना और देखना चाहते थे ।
भाभी की छोटी बहिन से रिश्ते की बात चल रही थी । यह कहा जा रहा था कि अगर ये रिश्ता हो गया तो मनोरमा को एक सहेली और बहिन मिल जाएगी । पिता अभिनव का पक्ष पहले जानना चाहते थे इस रिश्ते के बाबत सो वह कमरे में दाखिल हुए ।
आज न जाने क्या हुआ था कि अभिनव की आँख लग गई थी । पिता ने उस तस्वीर के ऊपर से पर्दा हटाया । वह हैरान रह गए । लगभग गश ही खा गए थे उस तस्वीर को देखकर । तुरंत पत्नी के कमरे में गए ।
“मंजुला ! गज़ब हो गया ये तो ।”
“क्या गज़ब हो गया ? क्या हो गया घर में ? तुम तो अभिनव की राय लेने गए थे ।शादी के बारे में ?” पत्नी ने कहा।
“वही तो , जो देखा मैंने उसे कोई समझ नहीं सकता । ” पति बैठते हुए बोले ।
“क्या देखा ? क्या नहीं समझ सकता कोई ? अभिनव तो बहुत अच्छा लड़का है । क्या कुछ कहा है उसने ?” पत्नी ने उत्सुकता जगाते हुए पूछा ।
“नहीं , वो सो रहा था । मैंने आज मनोरमा बहू की तस्वीर देखी जो अभिनव ने बनाई है ।”
“तो इसमें नया क्या है, वो तो उसके साथ बहुत हँसता बोलता था । एक मित्र की तरह हैं वे । “
“नहीं , अब मित्र से ज्यादा है । मैंने जो देखा है उसे एक बाप और दोस्त की नजर से देखकर आ रहा हूँ । इस बात को अब समझ रहा हूँ कि क्यो वह मनोरमा से अब कटा सा रहता है । दरअसल वो क्यों माना कर रहा था अभी शादी के लिए आज समय आ गया है कि हम उस तस्वीर को सही में पूरा कर दें ।” पिता बोले ।
“अरे! पहेलियाँ बुझाना छोड़ो । बात बताओ ।”
“तो सुनो , उसके कमरे में उसने मनोरमा की तस्वीर बनाई है । मनोरमा कुछ सोच रही है और उसके माथे पर बिंदी भी नहीं है । मुझे लगता है कि अभिनव मनोरमा के विषय में बहुत गहराई से सोचता है । तुम जाकर जरा बहू को टटोलो कि क्या अभिनव से उसे शादी करने में कोई गुरेज है ?” पति ने अपनी बात कह दी थी । पत्नी को बहुत आश्चर्य हुआ था मगर शादी के लिए जवाब भी देना जरूरी था और पति का सुझाव भी बहुत अच्छा था । वह मनोरमा के कमरे में चली गई और कुछ देर बातें करती रही । जब बाहर आई तब वह पति से बोली –
“मेरे साथ आओ । आज उसकी तस्वीर को आग लगानी है । मनोरमा ने तो कभी इस तरह से नहीं सोचा। उसने इंकार कर दिया है ।”
“हाँ, एक अच्छे घर की बेटी यही करती । वह कैसे अपनी बहिन का घर खराब कर सकती है । मानता हूँ अभिनव ने कभी मुंह से नहीं कहा मगर तीन साल से उसके चेहरे की रौनक गायब है । ये सिर्फ भाई का दुख नहीं बल्कि भाभी का दुख भी है । एक ही साल तो छोटा है मनोज से । “
“तुम कहना क्या चाहते हो जी ?” पत्नी ने सवाल किया ।
“अब तुम मेरे साथ आओ । मैं बताता हूँ तुम्हें क्या करना है । इस घर में मनोरमा ही अभिनव की बहू बनेगी । ” वह पत्नी का हाथ पकड़कर अभिनव के कमरे में पहुंचे । अभिनव अचानक से उन्हें आए देख खड़ा हो गया।
“तू बहुत बड़ा हो गया है रे । बाप से भी मन की बात नहीं कह सकता । ला आज तेरी तस्वीर को मैं देखता हूँ ।” और उन्होने तस्वीर से पर्दा हटा दिया । पास ही पड़े रंग और ब्रश को उठाया । लाल रंग से उस उदास पेंटिग के माथे पर एक बिंदी बना दी ।
“तुम यही चाहते थे न ….. मुझे गर्व है तुम पर । अगर एक दोस्त ऐसे प्यार करता हो तो हम कौन होते हैं रोड़ा अटकाने वाले । “
अभिनव का चेहरा खिल उठा था । वह माँ-बाप के पैरों में आशीर्वाद के लिए गिर पड़ा था ।
लेखक : केदारनाथ शब्द मसीहा

