शब्द मसीहा : वन्दे मातरम्….जय हिंद
कई दिनों से कर्फ्यू लगा हुआ था. घर में रखा खाना पानी भी खत्म हो चुका था . बड़े तो किसी तरह भूख से लड़ भी लें मगर बच्चों के मुँह नहीं देखे जा रहे थे . दिल मुँह को आता था मगर करें तो क्या करें .
गली में सायरन बजाती एक गाड़ी गुजरी . दोपहर के करीब डेढ़ बजे का समय था . भूख अपनी दस्तक से दरवाजे तोड़ रही थी . तभी उसे अपने बड़े अब्बू के लफ्ज़ याद आ गये – “सबसे पहला धर्म है शरीर की रक्षा करना . जिंदा रहो तभी इबादत हो सकती है .”
उसने निर्णय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाय .बच्चो के मुँह में आज कुछ न कुछ जरुर आएगा . वह दरवाजा खोल बाहर आ गया . कुछ जवान गली में घूम रहे थे . वह बिना घबराए सैनिकों के पास पहुँचा . पहले तो जवान भी सतर्क हुए उस के सर पर जालीदार टोपी और दाढ़ी को देख कर मगर जब वह बिना डरे आगे बढ़ा तो एक जवान चिल्लाया –
“वहीँ रुको ! मालूम नहीं कर्फ्यू लगा है ?”
“मालूम है साहेब ! टी वी में आता है . गली में आपकी मौजूदगी इसका सबूत है . मगर ….”
“मगर क्या ?”
“मेरे घर में छोटे बच्चे और बूढ़े माँ-बाप हैं . आप कर्फ्यू तो लगा देते हैं मगर भूख से नहीं कहते कि कर्फ्यू लगा है . पेट को कोई आँख नहीं होती साहब .”
जवान की तनी हुई बन्दूक नीचे हो गई थी . उसने उसके कंधे पर हाथ रखा और एक ओर ले गया . वहाँ एक टिफिन रखा था खाने का .
“भाई ! इसे ले जाओ . मासूमों के रोजे नहीं रहने चाहियें . अल्लाह की नजर में कुफ्र है ये और हम नाम से मुसलमान न सही ईमान से मुसलमान हैं .”
एक जवान ने खाने का टिफिन उसके हाथ में थमा दिया . वह घर की ओर देखते हुए आगे बढ़ गया . कुछ देर बाद घर की सारी खिड़कियाँ खोल दी गईं और घर के लोग एक स्वर में बोले -“वन्दे मातरम ….जय हिंद .”
शब्द मसीहा

