शब्द मसीहा की कहानी : बदला हुआ बेटा
बहुत समय से बेटा विदेश गया हुआ था। लेकिन विदेश जाकर भी माँ को वह भूला नहीं था। बेटे को जब भी माँ की याद आती तो वह उसे फोन करता, उसकी बातें सुनता। पहले शुरू-शुरू में तो बेटे को ख़ूब परेशानियों का सामना करता था विदेश में, तो बातें अक्सर हो जाती थीं। पर जैसे-जैसे बेटे को काम में सुगमता होती गई, बेटे की कमाई बढ़ती गई तो माँ-बेटे के बीच संवाद कम होने लगा।
काफी समय बाद बेटे का फोन आया था। वीडियो कॉल किया था। माँ घर में अपने काम में रमी हुई थी। बर्तन साफ करते में हाथ भी राख़ से सने हुए थे। फोन तो बेटे से कीमती नहीं होता है, सो माँ ने राख़ भरे हाथों से ही उसे उठा लिया था।
“नमस्ते माँ ! कैसी हो ?”
“ठीक हूँ बेटा, मुझ बूढ़ी का क्या। तू बता …तू तो ठीक है न।“ माँ ने कहा।
“ये किस के फोन से बात कर रही हो? मैंने तो बढ़िया फोन भेजा था तुम्हारे लिए। फिर इस फोन की फोटो इतनी बेकार क्यों आ रही है ?” बेटे ने पूछा।
“अरे! फोटो से क्या करना है । तू तो मुझे साफ दिखाई दे रहा है।“माँ ने मुस्कुराते हुए कहा।
“लेकिन मुझे क्यों लग रहा है कि ये मेरा भेजा हुआ फोन नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने फोन बेच दिया हो, और ये थर्डक्लास सस्ता फोन ले लिया हो।“ बेटे ने आशंका जताई।
“हम प्यार बांटने वाले देश के हैं, प्यार बेचने वाले देश के नहीं। बर्तन माझ रही थी, कहीं हाथ लग गया होगा बेटा। तेरी सौगात को कैसे बेच देती रे।“ माँ ने कहा और फोन को अपने पल्लू से पोंछ दिया। अब फोटो साफ आ रही थी।
“देखा न माँ, तुम्हें तो महंगी चीजें सम्हालना भी नहीं आता। कितना महँगा फोन है, तुम्हारे यहाँ तो एक लाख का होगा।“ बेटे ने कहा।
“बेटा ! फोन कितना भी महँगा या सस्ता हो , मैंने तो तेरी शक्ल देखने को रख रखा है । मेरे लिए तो तेरी शक्ल ही सबसे महंगी है , बेटा ! ममता तो रुपया, डॉलर नहीं जानती।“
और इसके बाद सिर्फ बेटे की आवाज़ आती रही …हैलो …हैलो । शक्ल बदलते ही बदले हुए बेटे का आभास हो गया था।
लेखक- शब्द मसीहा केदारनाथ दिल्ली में रहते हैं और भारतीय रेलवे में अधिकारी हैं।

